शिवसेना
कट्टर हिन्दुत्व में यकीन रखने वाली पार्टी है। शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे ने इसे पाकिस्तान, बांग्लादेश विरोधी, राम मंदिर समर्थक, कट्टर हिन्दुत्व की पार्टी का चेहरा दिया है। शिवसेना की इस छवि के कारण पार्टी को लगातार विपरीत स्थिति में भी दूसरे दल का साथ मिलने की गुंजाइश न के बराबर रहती थी। यहां तक कि कांग्रेस और एनसीपी जैसे दल भी शिवसेना के करीब जाने से परहेज कर रहे थे।
लोकसभा चुनाव से पहले तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का शिवसेना के साथ गठबंधन की संभावना को लेकर वक्तव्य नकारात्मक था। इसके सामानांतर शिवसेना के जहां भाजपा के साथ बने रहने की मजबूरी बन रही थी, वहीं भाजपा भी शिवसेना को अपने साथ बने रहने के लिए लाचार मानकर चल रही थी। अब शिवसेना के साथ कांग्रेस, एनसीपी के गठबंधन ने पार्टी के लिए सभी विकल्प खोल दिए हैं।
एनसीपी का दबदबा
एनसीपी की राजनीति का पूरा आधार महाराष्ट्र है। लंबे समय से एनसीपी महाराष्ट्र की सत्ता से बाहर है। जिस तरह से एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने राजनीतिक कौशल दिखाया है, उससे पवार के साथ एनसीपी का राज्य की राजनीति में दबदबा बढ़ेगा। इतना ही नहीं गुजरात और अन्य राज्यों में पार्टी को प्रसार सहायता मिलेगा।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि जो लाभ शिवसेना और कांग्रेस को मिलेगा, वही लाभ एनसीपी को भी मिलेगा। एनसीपी के पास भविष्य में कांग्रेस की बजाय शिवसेना और भाजपा के साथ जाने का विकल्प खुल सकता है। पार्टी का छूआछूत खत्म होगा और एनसीपी समय के आधार अपना हित देखकर राजनीतिक फैसले ले सकेगी।
भाजपा बोलेगी हमला, दिखाएगी कांग्रेस-शिवसेना को आईना
भाजपा के लिए महाराष्ट्र में सरकार बनाने का अवसर था, लेकिन शिवसेना के छिटकने से उसके हाथ खाली रह गए। यह पार्टी के लिए झटका है, लेकिन भाजपा के नेताओं का कहना है कि इससे महाराष्ट्र के नेताओं का राजनीतिक अहंकार चकनाचूर होगा। इससे भाजपा की एकता को बल मिलेगा। केन्द्रीय नेतृत्व का राज्य ईकाई पर प्रभाव और बढ़ेगा।
बताते हैं एनसीपी-शिवसेना-कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भाजपा के पास कांग्रेस की दोहरे मानदंड की राजनीति पर हमला करने का अवसर मिलेगा। पार्टी कांग्रेस की धर्म निरपेक्ष विचारधारा पर सवाल उठाकर इसे छद्म धर्मनिरपेक्षवाद कहकर हमला करेगी। शिवसेना के हिन्दुत्व को भी कठघरे में खड़ा करेगी।