तीन महीने में दिखा कैंपेन का असर, सामने आने लगी पाइरेसी का धंधा करने वाली कंपनियां...
बतौर जेनी वॉंग, स्वोर्ड नेट कैंपेन का असर तीन माह में दिखने लगा। जुलाई 2015 में म्युजिक पाइरेसी रोकने के लिए यह अभियान शुरू किया गया। सभी ऑन लाइन म्युजिक प्लेटफार्म मुहैया कराने वाली कंपनियों से कहा गया कि वे बिना लाइसेंस वाले ट्रैक को खत्म करें। नेशनल कॉपीराइट एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ दा पीपल रिपब्लिक ऑफ चाइना (एनसीएसी) के सहयोग से शुरू हुए इस अभियान में जुलाई 2015 के दौरान 16 बड़े म्युजिक प्लेटफार्म ने बिना लाइसेंस वाले 2.2 मिलियन साइटों का खुलासा कर दिया।
एनसीएसी ने बिना लाइसेंस वाली सामग्री को तय समय सीमा के भीतर हटाने का आदेश जारी कर दिया। सभी कंपनियों ने तीन माह में पाइरेसी वाले तमाम प्लेटफार्म बंद कर दिए और जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर लाइसेंस ले लिया। 410 कंपनियों ने यह बात स्वीकार कर ली कि वे पाइरेसी नियमों का उल्लंघन कर रही थी। इसके बाद 42 वेबसाइट का कामकाज रोक दिया गया। 32 वेबसाइट ने अपना बिजनेस मॉडल बदल लिया और 129 वेबसाइट डिलिट कर दी गई।
'स्वोर्ड नेट एक्शन' का लाभ: 98.8 प्रतिशत कंपनियों ने पाइरेसी पर रोक लगा दी ...
चीन में शुरू हुए स्वोर्ड नेट एक्शन का फायदा यह हुआ कि बहुत कम समय में 98.8 प्रतिशत कंपनियों ने पाइरेसी पर रोक लगा दी। भारत में तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद यह प्रतिशत 45.1 रहा है। स्वोर्ड नेट एक्शन से नियमों का उल्लंघन करने वाली व्यक्तिगत साइटों में भी कमी आई। 2015 में ऐसी 300 प्लस वेबसाइट थी, इनमें चीन के अधिकार क्षेत्र में उल्लंघन करने वाली साइट भी शामिल हैं। 2019 में इनकी संख्या 71 रह गई है। चीन की लोकल एनफोर्स यूनिटों ने इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ दा फोनोग्राफी इंडस्ट्री के साथ मिलकर काम किया। ऑनलाइन पाइरेसी के मामलों की जांच के लिए नई तकनीकें सीखी।
मामलों की जांच कई स्तर पर हुई। एनसीएसी से प्रोविन्सियल लेवल ऑफ दा कल्चर ब्यूरो के पास मामले भेजे गए। यहां से एनफोर्समेंट टीम सिटी लेवल को निर्देश दिए गए। इसके बाद प्रोविन्सियल लेवल ऑफ दा कल्चर ब्यूरो को रिपोर्ट सौंपी गई। हालांकि एनफोर्समेंट प्रक्रिया शुरू होने के लिए कुछ शर्तें रखी गई थी। जैसे पाइरेसी की अवैध कमाई का ग्राफ आरएमबी 50 हजार से अधिक हो, उल्लंघन वाला कंटेंट 500 आइटम से ज्यादा हो और उल्लंघन की श्रेणी में आने वाली सामग्री को 50 हजार से ज्यादा बार क्लिक किया गया हो।
इसके बाद उल्लंघन के मामलों की जांच के लिए अलग से एक एप बनाया गया। सभी कंपनियों के लिए आईसीपी रजिस्ट्रेशन कोड लेना अनिवार्य कर दिया गया। सभी तरह की सूचना वेबसाइट पर डालना जरूरी हुआ। संबंधित कंपनियों के लिए अपनी वेबसाइट पर आईसीपी रजिस्ट्रेशन का डिस्प्ले करना अनिवार्य बना दिया गया। नतीजा, इन सब प्रयासों के चलते पाइरेसी के मामले 97.43 प्रतिशत तक नीचे आ गए। 6191 लिंक ऐसे मिले, जो चीन में संचालित नहीं हो रहे थे।
भारत में पाइरेसी कैसे रूके, इस पर कुछ दूसरे विशेषज्ञों की राय...
फिक्की के चेयरमैन नरेंद्र सभरवाल का कहना था कि हमारे देश में पाइरेसी के चलते 15 सौ करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। इसके लिए कानूनों में बदलावा लाना होगा। कॉपीराइट मामलों की जांच के लिए अलग से यूनिटों का गठन किया जाए। आईएफपीआई के डायरेक्टर (कन्जयूमर इनसाइट एंड ऐनालिसिस) डेविड प्राइस ने बताया, भारत जैसे देश में स्ट्रीमिंग कल्चर विकसित करनी होगी। आईएफपीआई के अध्यक्ष फ्रांसिस मूरे का कहना था, पाइरेसी के खिलाफ अधिक कानून बनाने की जरूरत है।
इंडियन म्युजिक इंडस्ट्री का 18 फीसदी राजस्व डिजिटल प्लेटफार्म से आ रहा है। स्पोटीफाई के निदेशक अमरजीत सिंह ने बताया, कानून ठीक हैं, उन्हें सख्ती से लागू करना होगा।पाइरेसी को लेकर लोगों को शिक्षित करना भी जरूरी है। इंडियन सिंगर राइट एसोसिएशन के सीईओ संजय टंडन बोले, म्युजिक कंपनियों की यह सोच कि वन टाइम पेमेंट लो और जाओ या रायल्टी लेकर काम खत्म, यह माइंडसेट बदलना होगा।
लोगों को बताया जाए कि लीगल स्ट्रीमिंग कितना आसान है। इसके बावजूद कोई नहीं सुधरता तो साइट पर ही बैन लगा दिया जाए। लीगल स्ट्रीमिंग की प्रक्रिया को आसान बनाया जाए। पेमेंट के तरीकों में सुधार हो। इस बात का ध्यान रखा जाए कि ब्लोकिंग के दौरान कोई लीगल साइट बंद न हो। यूजर को फेयर वेल्यू का महत्व बताया जाए। हालांकि सभी विशेषज्ञों का कहना था कि कानून जब तक सख्त नहीं होगा तो तब तक पाइरेसी को रोक पाना संभव नहीं है।