तेलंगाना में सत्तारूढ़ टीआरएस के साथ भी कांग्रेस की सीधी लड़ाई है, जबकि तेलंगाना के मुख्यमंत्री और टीआरएस प्रमुख के. चंद्रशेखर राव गैर कांग्रेस गैर भाजपा मोर्चे के सबसे बड़े पैरोकार बनकर उभरे हैं।
यहां कांग्रेस को गठबंधन से ज्यादा अपना जनाधार बचाने की चुनौती है और टीआरएस के साथ गठबंधन उसे अपने जनाधार और कार्यकर्ताओं की कीमत चुका कर ही करना होगा। जबकि बंगाल में अगर कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन करती है तो उसे ममता बनर्जी की कृपा पर नाम मात्र की सीटों पर ही संतोष करना होगा।
यही हालत उत्तर प्रदेश में होगी जहां से लोकसभा की 80 सीटें हैं। यहां सीटों का बड़ा हिस्सा सपा और बसपा के बीच बंटेगा। गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनावों में अपने लचर प्रदर्शन की वजह से कांग्रेस देश के इस सबसे बड़े राज्य में सपा-बसपा गठबंधन में अगर शामिल होती है तो उसे दस से ज्यादा सीटें मिलेंगी, इसमें संदेह है।
असम में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस ही प्रमुख पार्टी है, लेकिन यहां भी बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के साथ गठबंधन किए बिना मुस्लिम वोटों का बंटवारा रोक पाना नामुमकिन है।
आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू बेंगलुरु में विपक्षी नेताओं के साथ मंच पर थे और मोदी सरकार से अपने मंत्रियों के इस्तीफे और एनडीए से नाता तोड़ने के बाद से ही चंद्रबाबू तीसरे मोर्चे की राजनीति में सक्रिय हैं। क्या कांग्रेस आंध्रप्रदेश में तेलुगू देशम के साथ गठबंधन करेगी या फिर राज्य में विपक्षी ताकत जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाएगी या अकेले चलेगी।
ड़ीसा में जिस तरह भाजपा आगे बढ़ रही है, उसने नवीन पटनायक के बीजू जनता दल के लिए चुनौती बढ़ गई है। क्या कांग्रेस बीजद के साथ दोस्ती करेगी। दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का क्या रिश्ता होगा और हरियाणा में क्या कांग्रेस ओम प्रकाश चौटाला के इंडियन नेशनल लोकदल के साथ क्या करेगी।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि 2019 में वह लोकसभा में अपनी सीटें कम से कम 150 से ज्यादा लाए तभी सरकार बनाने के लिए अन्य भाजपा विरोधी दल उसके साथ आ सकते हैं, वरना उसे ही गैर भाजपा सरकार का सिंहासन अपने कंधों पर ढोना होगा। लेकिन कांग्रेस यह आंकड़ा कहां से जुटाएगी।
उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, प. बंगाल जैसे राज्यों में उसकी स्थिति अपने गठबंधन के साथी की बी या सी टीम की है और उसके हिस्से नाम मात्र की सीटें ही आएंगी। अपने बलबूते पर कांग्रेस सिर्फ हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, केरल, उड़ीसा और पूर्वोत्तर के राज्यों में ही लड़ेगी।
जबकि कर्नाटक में उसे जद (एस) और महाराष्ट्र में एनसीपी, झारखंड में झामुमो, जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेस के लिए कई सीटें छोड़नी पड़ेगी। इसलिए कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए अपने जनाधार वाले राज्यों में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना और गठबंधन वाले राज्यों में लड़ी गई ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की एक बड़ी चुनौती है।
2019 में त्रिशंकु लोकसभा या मिले जुले जनादेश की बन रही संभावनाओं ने सभी क्षेत्रीय दलों के नेताओं विशेषकर मायावती और ममता बनर्जी में प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षाओं को भी जगा दिया है।
कांग्रेस नेतृत्व को उन्हें साधे रखने और भाजपा विरोधी मोर्चे की कमान अपने हाथ में लेने के लिए इसी साल अक्तूबर-नवंबर में संभावित मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम में अपना शानदार प्रदर्शन करना होगा। अगर इन राज्यों में कांग्रेस चुनाव जीतने में कामयाब रही तो तो क्षेत्रीय दल उसका दबदबा मानेंगे वरना उसे उनके साथ उनके दबाव को मानने की मजबूरी होगी।