बिजली का उत्पादन 2007 में शुरू हुआ और पांच साल बाद इन कंपनियों ने विद्युत विनियामक आयोग जाकर दरें बढ़ाने पर दबाव बनाना शुरू किया। 2012 से 2017 तक पांच साल इस पर बहस हुई। आयोग के बाद अंत में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सर्वोच्च न्यायालय ने 11 अप्रैल 2017 फैसला सुनाया। फैसले में अडानी, टाटा और एस्सार को निर्देश दिए गए कि बिजली की दर वही होनी चाहिए जो समझौते में थीं।
इन कंपनियों की एप्लिकेशन की मंजूरी नहीं दी और कहा कि बिजली दर बढ़ाने के लिए कोई कारण नहीं है। अंतिम फैसला आने के बाद भी पसंदीदा पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए तीन जुलाई 2018 को एक अधिसूचना जारी की गई है। जिसमें कहा गया कि केंद्र सरकार के साथ बैठक करने के बाद गुजरात सराकर ने एक समिति का गठन करने का फैसला लिया है।
तीन सदस्यों की गठित समिति सरकार को सुझाव और सिफारिश करेगी कि इन तीन कंपनियों को राहत कैसे पहुंचाई जा सकती है जो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लघंन है।
जब सुप्रीम कोर्ट ने राहत का दरवाजा बंद कर दिया है तो मोदी सरकार राज्य सरकार अधिसूचना जारी कर उसे खोलने में लगी हुई है। समिति कंपनियों के हित में रिपोर्ट देगी और पांच राज्यों के उपभोक्ताओं पर बोझ पड़ेगा।