जस्टिस यादव के खिलाफ राज्यसभा में विपक्ष के 55 सांसदों ने महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि जांच में इनमें से 8 सांसदों के हस्ताक्षर मैच नहीं हुए। इसके अलावा तीन अन्य सांसदों ने भी अपने हस्ताक्षर पर सभापति कार्यालय को कोई जवाब नहीं दिया है।
संसद के मानसून सत्र में जस्टिस यशवंत वर्मा की तर्ज पर जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की विपक्ष की मुहिम पर पानी फिर सकता है। दरअसल, सरकार का कहना है कि दोनों मामलों की तुलना उचित नहीं है। ऐसा इसलिए कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने का फैसला सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जांच रिपोर्ट आने के बाद किया गया है, जिसमें उन पर लगे आरोपों की पुष्टि की गई है।
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सरकार के एक वरिष्ठ सूत्र ने कहा कि दोनों मामलों की तुलना नहीं की जा सकती। जस्टिस यादव के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था, हालांकि आंतरिक जांच नहीं हुई। इसके उलट जस्टिस वर्मा के मामले में उनके खिलाफ लगे आरोपों की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा कि इस सबसे इतर जस्टिस यादव के खिलाफ राज्यसभा में दिए गए महाभियोग प्रस्ताव में कई त्रुटियां हैं, हालांकि इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय सभापति जगदीप धनखड़ करेंगे।
8 सांसदों के हस्ताक्षर मेल नहीं हुए
जस्टिस यादव के खिलाफ राज्यसभा में विपक्ष के 55 सांसदों ने महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि जांच में इनमें से 8 सांसदों के हस्ताक्षर मैच नहीं हुए। इसके अलावा तीन अन्य सांसदों ने भी अपने हस्ताक्षर पर सभापति कार्यालय को कोई जवाब नहीं दिया है। नियमानुसार महाभियोग के लिए राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए। ऐसे में अगर 8 सांसदों के हस्ताक्षर मैच नहीं हुए तो यह प्रस्ताव अस्वीकृत हो जाएगा।