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आओ खेलें आजादी-आजादी

Sat, 11 Aug 2018 12:12 AM IST
डॉ आशीष जैन
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freedom
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नहीं..नहीं...मैं उस आजादी की बात नही कर रहा जो दिल्ली के विख्यात विश्वविद्यालय में मुट्ठी भर किशन कन्हैया एकत्रित होकर नारे लगा लगा कर लेते हैं - ‘हम लेकर रहेंगे आजादी’। मैं तो उस वास्तविक आजादी की बात कर रहा हूं जो सात दशक पहले ब्रितानी राजघराने से सत्ता हस्तांतरित कर एक भारतीय राजघराने को सौंपने के बाद मिली थी।
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हां..हां...वही, जिसकी वर्षगांठ पर प्रतिवर्ष छुट्टी होती है, पर अफसोस ‘ड्राय-डे’ भी होता है। वही छुट्टी मनाने वाली आजादी। जो लोग इस छुट्टी में शनिवार और रविवार को मिलाकर सिंगापुर और बैंकॉक नहीं जा पाते, उन्हें ज्ञात होगा कि उस दिन मुर्गे की बांग से पहले ही लाउड स्पीकर बजना चालू हो जाते हैं। ‘ये देश है वीर जवानो का’ और ‘ए मेरे वतन के लोगों’ के गीतों से आकाश गुंजायमान हो जाता है। 

एक रात पहले ‘कुछ कर गुजरने’ को लालायित युवा रात से ब्रह्म मुहुर्त तक पार्टी नंबर्स पर थिरक थिरक कर थके मांदे घर आते हैं, क्योंकि पंद्रह अगस्त की छुट्टी जो होती है। पर इन गानों के शोर से प्राय: उनकी नींद में बाधा भी उत्पन्न होती है। इस खेल में मंझे हुये खिलाड़ी इसीलिए खिड़की दरवाजे बंद करके सोते हैं। कुछ संगठनों ने इस दिन होने वाले शोर के विरोध में न्यायालय में याचिका दायर करने की योजना भी बनाई है। हालांकि समाचार लिखे जाने तक इसकी कोई पुष्ट जानकारी हाथ नहीं लगी है। फिलहाल इसे व्हाट्सएप पर फैली हुई एक ‘फेक न्यूज’ मान लेना ही उचित है।
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इतिहास की मेरी समस्त जानकारी का श्रेय एनसीईआरटी की पुस्तकों को जाता है। ये चुनिंदा विचारधारा से प्रभावित बुद्धिजीवियों द्वारा अंग्रेजी में लिखी किताबों का हिंदी अनुवाद है। बचपन से लेकर शालायी शिक्षा पूर्ण होने तक भारत की स्वतंत्रता मेरे लिए एक 200 शब्दों का निबंध था, जो हर अगली कक्षा में 50 शब्द प्रति वर्ष के अनुपात से बढ़ जाया करता था। भला हो मेरे ज्येष्ठ भाई-बहनों का, जिनकी पुरानी कापियां रद्दी में जाने से रोक दी जाती थीं, जिससे मुझे निबंध लिखने में कभी कोई कठिनाई नहीं हुई। 

आजकल के परिवारों में तो ‘हम दो हमारा एक’ सिद्धांत के तहत सीमित वंशवर्धन किया जाता है। ऐसे दुर्भाग्यहीन कर्णधारों के लिए गूगल ने विशेष व्यवस्था की है। एक ही क्लिक में प्रत्येक कक्षा और प्रत्येक शब्द सीमा के लिए निबंध उपलब्ध है, यहां तक कि हिन्दी में भी। गांधीजी का चंपारण सत्याग्रह और भगत सिंह का आजादी में योगदान मेरे लिए दस-दस नंबर के दो महत्वपूर्ण लघु उत्तरीय प्रश्न थे। इधर, हमारे इतिहास के अध्यापक वयोवृद्ध नेहरूवादी होने की साथ साथ देश के राजनीतिक भविष्य के जानकार भी थे। अत: उन्होंने कभी भी सुभाष चंद्र बोस का पाठ नहीं पढ़ाया। पूछने पर कह देते, यह आवश्यक नहीं है... भविष्य में कोई भी इस विषय पर तुमसे कुछ नहीं पूछेगा।

एक पाठ तो बचपन से आज तक मुझे याद है, वह है - बड़ी कठिनाईयों से हमें अंग्रेजों से आजादी मिली थी.... क्यों? हमने छीन क्यों नहीं ली? हमारी ही तो थी। एक बात जो मेरी तुच्छ समझ से परे है कि उन्होंने जो टुकड़े-टुकड़े हमें परोसे, वो हमने ले क्यों लिए? क्यों नहीं कहा, भाई बहुत हुआ, आप निकाल लो, अब हम अपना घर संभाल लेंगे? और अगर मान लो कहा भी था और अंग्रेजों ने नहीं माना तो जो उन्होंने जो दिया वह हमने कैसे मान लिया? क्या भय था? कैसी चिंता थी? क्या गृह युद्ध, दंगे या फिर अराजकता का डर था। 

वह तो फिर भी हुआ बंटवारे में। और तो और जो विभाजन की त्रासदी में मारे गए उनके परिजनों को तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कोटे में शासकीय नौकरी तक नहीं मिली। पर लगता है मामला कुछ और ही था, जिसे राष्ट्र निर्माताओं और पाठ्यक्रम रचयिताओं ने हमें किसी भी अध्याय में नहीं बतलाया। संभवत: व्यर्थ के अहम के कारण, व्यर्थ में हम बंट गए और व्यर्थ में लोग मारे गए। बहरहाल, पौन सदी बीत जाने के बाद इसकी बात करना ही व्यर्थ है।

उफ्फ!! आपकी यह पूर्वाग्रही सोच! लगता है ट्विटर पर ट्रोल करना ही पड़ेगा। आप न जाने किस आजादी की बात कर रहे हैं? सेना पर पत्थर फेंकने की आजादी या गाय के लिए मनुष्य की जान लेने की आजादी। या फिर बच्चियों के साथ बलात्कार की आजादी? अरे, ये तो बहुत बड़ी बातें हैं, मैं तो गलत दिशा में गाड़ी चलाने की आजादी या सड़क पर ही मल मूत्र विसर्जन की आजादी या गाड़ी ठुक जाने पर ठोक देने की आजादी की भी बात नहीं कर रहा। 

मैं तो उस आजादी की बात कर रहा हूं जिसकी हर वर्षगांठ पर लालकिले की प्राचीर से भूतपूर्व प्रधानमंत्री, अफसरों का लिखा भाषण पढ़ते थे और जहां से आजकल ‘साहेब’ चुनावी रैलियां संबोधित करते हैं। मेरे स्वयं के लिए तो आजादी मेरा राष्ट्र के प्रति और राष्ट्र का मेरे प्रति वह संकल्प है जिससे हम एक-दूसरे के लिए प्रतिबद्ध हैं और एक दूसरे को सुरक्षा और प्रगति के अवसर प्रदान करते हैं। 

यह हर दिन दिखाने और बहस करने की वस्तु नहीं है। ये तभी अपने चरम पर है जब ये अदृश्य होती है। यह वो प्राणवायु है जो दिखती भी नहीं पर जिसके बिना जीवन संभव भी नहीं। ये मेरी जेब में रखा वो दो हजार का नोट है जो मुझे सड़क पर और बाजार में आत्मविश्वास और संबल देता है, पर जिस दिन उसे भुनाने की आवश्यकता पड़ी, याने सब समाप्त। कक्षा पांच से नियमित पढ़ रहे हैं, आजादी लेने के लिए हमने बड़ी कीमत चुकाई है... कितनी? पता नहीं? पर आजकल के दौर में बहुत महंगा पड़ रहा है ये आजादी का खेल।
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लेखकः डॉ आशीष जैन, मैक्स सुपर स्पेशियल्टी हॉस्पिटल, साकेत, नई दिल्ली में श्वास रोग विशेषज्ञ और वरिष्ठ परामर्शदाता हैं।
 
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