नवजोत सेना की स्पेशल फोर्स के पैरा-2 के कमांडिंग ऑफिसर थे। 2018 में उन्हें नियमित प्रशिक्षण के दौरान दाएं हाथ में सूजन महसूस हुई। बाद में जब उन्होंने डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि उन्हें दुर्लभ किस्म का कैंसर है। मुंबई के टाटा कैंसर रिसर्च सेंटर से लेकर अमेरिका तक इलाज हुआ, लेकिन पूरे शरीर में कैंसर का फैलाव रोकने के लिए डॉक्टरों ने उनके हाथ को काट दिया। इसके बावजूद फौलादी कर्नल बल ने हार नहीं मानी।
एक हाथ से लगाते थे 50 पुशअप
बल ने जीवन के सभी काम एक हाथ से करने में महारत हासिल कर ली। नहाने-धोने, जूते के फीते बांधने, दस्तखत करने जैसे सारे काम उन्होंने बाएं हाथ से सीख लिए थे। एक हाथ से ही दो महीने बाद उन्होंने राजस्थान में सैन्य अभियान में हिस्सा लिया। एक हाथ से 50 पुशअप लगा लिया करते थे।
कर्नल कैंसर के खिलाफ डटे थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कैंसर ने उनके शरीर के अन्य हिस्से को भी जकड़ लिया। बृहस्पतिवार को बंगलूरू के अस्पताल में अंतिम सांस से चंद पलों पहले जो सेल्फी ली, उसमें उनके चेहरे पर शिकन का नामोनिशान नहीं है।
कर्नल नवजोत बल को कश्मीर की लोहाब घाटी में आतंकियों के एक समूह के सफाये के लिए शौर्य चक्र से नवाजा गया था। वह कांगो में संयुक्त राष्ट्र सैन्य मिशन के तहत भी तैनात रहे। दिल्ली धौला कुआं आर्मी पब्लिक स्कूल से पढ़ाई करने वाले बल ने 1998 में एनडीए में प्रवेश पाया था। 2002 में पैरा-2 में नियुक्त हुए थे। 20 मार्च 2018 को बंगलूरू में पैरा-2 के कमांडिंग ऑफिसर बने।
कर्नल बल को याद करते उनके साथियों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में इतना बहादुर, साहसी जिंदादिल और शौर्यवान सैन्य अफसर नहीं देखा। कैंसर जैसी घातक बीमारी को झेलते रहने के बावजूद जिंदगी और सेना के प्रति उनका जज्बा कम नहीं हुआ। उनके साथ काम कर चुके कई अधिकारियों ने उनकी बहादुरी और समर्पण को सेना के लिए एक नजीर बताया है।