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कॉलेजियम ने की 20 वकीलों को हाईकोर्ट जज बनाने की सिफारिश

Fri, 26 Jul 2019 05:08 AM IST
Avdhesh Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : social media
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सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने बृहस्पतिवार को 20 वकीलों के नामों की सूची केंद्र सरकार को भेजी। इन सभी को हाईकोर्ट में जज बनाने की सिफारिश की गई है। सरकार से मंजूरी मिलने पर इन सभी को पंजाब व हरियाणा, राजस्थान, कलकत्ता, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के हाईकोर्ट में नियुक्त किया जाएगा।
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शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड की जानकारी के मुताबिक, चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में जस्टिस एसए बोबडे और एनवी रमाना की मौजूदगी वाले कॉलेजियम ने इन हाईकोर्ट में नियुक्ति के लिए 35 नामों पर विचार किया था। इन 35 में से 20 के नाम सरकार को नियुक्ति के लिए भेज दिए गए हैं, जबकि 12 नाम संबंधित हाईकोर्ट को वापस लौटा दिए गए हैं। तीन अन्य नामों पर विचार को स्थगित कर दिया गया है। 

कहां के लिए किसका नाम

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट : जसगुरुप्रीत सिंह पुरी, सुवीर सहगल, गिरीश अग्निहोत्री, अलका सरीन और कमल सहगल।
कलकत्ता हाईकोर्ट : जयतोष मजूमदार, अमितेश बनर्जी, राजा बासु चौधरी, लपिता बनर्जी, साक्य सेन और कौशिक चंदा।
राजस्थान हाईकोर्ट : महेंद्र गोयल और फरजंद अली।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट : आर. रघुनंदन राव, बी. देवानंद, डी. रमेश और एन. जयसूर्या।
तेलंगाना हाईकोर्ट : टी. विनोद कुमार, ए. अभिषेक रेड्डी और के. लक्ष्मण।

कॉलेजियम नहीं, इंफ्रास्ट्रक्चर और खाली पद हैं न्यायपालिका के लिए चिंता : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कठोर टिप्पणी करते हुए कहा कि शीर्ष अदालतों में जजों की नियुक्ति करने वाले कॉलेजियम की कार्य प्रणाली नहीं, बल्कि न्यायपालिका के लिए निचली अदालतों में पर्याप्त बुनियादी ढांचे की कमी और भारी संख्या में खाली पड़े जजों के पद चिंता का सबब होना चाहिए। 

देश में बच्चियों के साथ दुष्कर्म के मामलों में तेज बढ़ोतरी के मुद्दे पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी की। साथ ही दुख जताया कि राष्ट्रीय राजधानी से दूर के क्षेत्रों में न्याय अधिकारियों को विपरीत हालातों में काम करना पड़ रहा है। 

दरअसल सुनवाई के दौरान अमाइकस क्यूरी वरिष्ठ वकील वी. गिरी ने पीठ को बताया कि दिल्ली की साकेत अदालत में दो पोक्सो कोर्ट काम कर रहे हैं। इस पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि वह सिर्फ दिल्ली की बात नहीं कर रहे हैं। उन्होंने सवाल किया कि मध्य प्रदेश, ओडिशा और त्रिपुरा आदि की अदालतों की वास्तविक स्थिति क्या है? 

मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अब भी प्राइवेसी का मतलब कोर्ट के अंदर पीड़िता और आरोपी के बीच महज एक पर्दे को माना जा रहा है। चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस दीपक गुप्ता व जस्टिस अनिरुद्ध बोस की मौजूदगी वाली पीठ ने कहा कि दिल्ली के साकेत कोर्ट की तुलना देश के अन्य भागों में मौजूद अदालतों से नहीं की जा सकती। पीठ ने कहा, हम उन राज्यों की बात कर रहे हैं, जहां आधारभूत सुविधाओं का घोर अभाव है। 

वहां मजिस्ट्रेट के लिए बमुश्किल कोई कमरा होता है। चार गुना चार साइज के छोटे से चैंबर में मजिस्ट्रेट बैठते हैं। हमने इसे देखा है और अदालतों की यही सच्चाई है। पीठ ने कहा, यह कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जो न्यायपालिका को प्रभावित कर रहे हैं न कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को। कहीं न कहीं हम ट्रैक से उतर गए हैं। 
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5 हजार पद खाली और विधायिका थोप रही नए-नए कानून

पीठ ने टिप्पणी की कि देश में न्याय अधिकारियों (जजों) के करीब 5,000 पद खाली हैं और विधायिका एक के बाद एक नया कानून लेकर आ रही है। पीठ ने कहा, एक ही जज पर मामलों की ‘पंपिंग’ हो रही है और हम चाहते हैं कि मामलों में निर्णय 6 महीने से 1 साल के अंदर हो जाए। हमें अदालतों में आवश्यक बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना होगा। पीठ ने कहा, राज्य अपने दम पर ये सभी काम नहीं कर सकते और हम सुनिश्चित करना चाहेंगे कि केंद्र सरकार इन सभी सुविधाओं का बोझ उठाए। 

राज्यों में जुवेनाइल पुलिस की क्या है स्थिति

शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान अमाइकस क्यूरी वी. गिरी से राज्यों में विशेष जुवेनाइल पुलिस की वर्तमान स्थिति को लेकर सवाल किया। गिरी ने बताया कि राज्यों में विशेष जुवेनाइल पुलिस होनी चाहिए, लेकिन किसी भी राज्य ने इसके गठन की तरफ ध्यान नहीं दिया है। पीठ ने गिरी को यह जानकारी जुटाकर बताने के लिए कहा कि कितने राज्यों में विशेष जुवेनाइल पुलिस का गठन किया गया है और कितनों में नहीं। 

अदालतों पर बोझ

250 पोक्सो से जुड़े मामले दर्ज हैं देश के हर जिले में औसतन
400 मामलों के ट्रायल का बोझ है दिल्ली में एक पोक्सो जज पर
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