जलवायु में आ रहा बदलाव हर व्यक्ति से उसके जीवन के औसतन छह महीने छीन रहा है। यदि वार्षिक औसत तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो उससे लोगों की जीवन प्रत्याशा 0.44 वर्ष यानी करीब साढ़े पांच माह तक कम हो जाएगी।
बांग्लादेश की शाहजलाल यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी और द न्यू स्कूल फॉर सोशल रिसर्च, न्यूयाॅर्क से जुड़े शोधकर्ता अमित रॉय के हाल में किए अध्ययन में इसका खुलासा हुआ है। अध्ययन में उन्होंने 191 देशों में 1940 से 2020 के बीच तापमान, वर्षा और जीवन प्रत्याशा से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया है। अध्ययन के नतीजे जर्नल प्लोस क्लाइमेट में प्रकाशित हुए हैं।
शोध के अनुसार, वैश्विक स्तर पर बदलाव का असर अलग-अलग रूपों में सामने आने लगा है। यह हमारे भोजन, पानी, हवा और मौसम को प्रभावित कर स्वास्थ्य के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2030 से 2050 के बीच जलवायु परिवर्तन सालाना करीब ढाई लाख मौतों की वजह बन सकता है। साथ ही इसकी वजह से प्रति वर्ष वैश्विक आय में 400 करोड़ डॉलर से ज्यादा का नुकसान होगा।
महिलाओं को ज्यादा खतरा
जलवायु परिवर्तन से पुरुषों की तुलना में महिलाओंं की जीवन प्रत्याशा को ज्यादा प्रभावित कर रहा है। यदि वार्षिक जलवायु परिवर्तन सूचकांक 10 अंक बढ़ता है तो जहां पुरुषों की जीवन प्रत्याशा पांच महीने तो महिलाओं की सात महीने घट रही है।
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव शामिल
जलवायु परिवर्तन का लोगों के स्वास्थ्य पर असर को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने इसके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों को शामिल किया है। प्रत्यक्ष प्रभावों में लू, बाढ़, सूखा को शामिल किया है जबकि अप्रत्यक्ष प्रभावों में आर्थिक प्रणालियों और पारिस्थितिक तंत्र है।
तापमान और वर्षा के अलग-अलग प्रभावों का अध्ययन करने के अलावा जलवायु परिवर्तन सूचकांक भी तैयार किया है, जो बदलावों की गंभीरता को मापने के लिए इन दोनों कारकों को जोड़कर देखता है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि जलवायु परिवर्तन से कृषि पैदावार पर असर पड़ने से खाद्य कीमतों में इजाफा होगा।