भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने साफ कहा है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ही संवैधानिक अदालतें हैं और इनमें कोई छोटा या बड़ा नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट का कोलेजियम हाईकोर्ट के कोलेजियम को किसी खास नाम की सिफारिश करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। जजों की नियुक्ति पर यह बयान उन्होंने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में दिया।
सीजेआई गवई ने कहा कि संविधान के ढांचे में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों बराबर हैं। कोई भी अदालत दूसरी से श्रेष्ठ या हीन नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जजों की नियुक्ति में पहला फैसला हाईकोर्ट कोलेजियम लेता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ नामों की सिफारिश कर सकता है और उनकी योग्यता पर विचार करने की अपील कर सकता है।
जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया
उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने पूर्व सीजेआई संजीव खन्ना के कार्यकाल में एक नई परंपरा शुरू की थी, जिसमें जज बनने के इच्छुक उम्मीदवारों से व्यक्तिगत बातचीत की जाती है। यह प्रक्रिया 10 से 30 मिनट तक चलती है और इससे उम्मीदवार की समाज में योगदान देने की क्षमता का आकलन करने में मदद मिलती है।
स्वतंत्रता सेनानियों को किया याद
कार्यक्रम में सीजेआई गवई ने झारखंड के संथाल विद्रोह, बिरसा मुंडा, ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले, रवीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और मौलाना आजाद जैसे नेताओं के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम सिर्फ राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि एक नैतिक और कानूनी संघर्ष भी था, जिसमें कई वकीलों ने अहम भूमिका निभाई।
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वकीलों और जजों की जिम्मेदारी
सीजेआई गवई ने कहा कि कोई भी मामला छोटा नहीं होता। जो विवाद किसी को मामूली लगे, वह किसी अन्य के लिए जीवन, गरिमा या अस्तित्व का सवाल हो सकता है। उन्होंने वकीलों और जजों से अपील की कि वे संविधान की मूल भावना को अपनाएं और समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा करें।
भारत की प्रगति और अधूरी जिम्मेदारी
उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का उदाहरण देते हुए कहा कि संथाल समुदाय की बेटी का देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचना भारत की लंबी यात्रा को दर्शाता है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अभी भी एक समान, न्यायपूर्ण और सुरक्षित भारत बनाने का काम अधूरा है।
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संविधान की मूल भावना का पालन
सीजेआई गवई ने कहा कि हर जज और वकील की जिम्मेदारी है कि वह सिर्फ कानून की व्याख्या ही न करे, बल्कि स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के मूल्यों को बढ़ावा भी दे। उन्होंने संकल्प लिया कि आने वाली पीढ़ियों को ऐसा भारत सौंपा जाए जहां कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न हो, कोई महिला डर में न जिए और हर नागरिक की आवाज सुनी जाए।