भारत के विधि आयोग ने 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' यानी समान नागरिक संहिता को लेकर आम लोगों की राय माँगी है। इसके लिए आयोग ने प्रश्नावली जारी की है। इसमें कुल मिलाकर 16 बिंदुओं पर राय माँगी गयी है।
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मगर, पूरा फोकस इस बात पर है कि क्या देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान संहिता होनी चाहिए? प्रश्नावली में विवाह, तलाक, गोद लेना, गार्डियनशिप, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार और विरासत शामिल से जुडे सवाल हैं। आयोग ने इस बारे में भी राय मांगी है कि क्या ऐसी संहिता बनाई जाए जिससे समान अधिकार समान तो मिले ही साथ ही, देश की विविधता भी बनी रहे।
लोगों से यह भी पूछा जा रहा है कि क्या समान नागरिक संहिता ऑपशनल यानी वैकल्पिक होनी चाहिए। लोगों की राय पॉलीगेमी यानी बहुपत्नी प्रथा, पोलियानडरी (बहु पति प्रथा), गुजरात में प्रचलित मैत्री करार सहित समाज की कुछ ऐसी प्रथाओं के बारे में भी माँगी गयी है जो अन्य समुदायों और जातियों में प्रचलित हैं। इन प्रथाओं को कानूनी मान्यता तो नहीं है मगर समाज में इन्हें कहीं कहीं पर स्वीकृति मिलती रही है।
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1956 में इस कानून को गोवा के हिंदुओं के अलावा सब पर लागू कर दिया गया
पॉलीगेमी - बहुपत्नी प्रथा
- फोटो : BBC
देश के कई प्रांत हैं जहां आज भी इनमे से कुछ मान्यताओं का प्रचलन है। गुजरात में 'मैत्री करार' एकमात्र ऐसा प्रचलन है जिसकी कानूनी मान्यता है क्योंकि यह करार मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर से ही अनुमोदित होता है। अब विधि आयोग ने पूछा है कि क्या ऐसी मान्यताओं को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए या फिर इन्हें कानून के जरियर नियंत्रित करना चाहिए।
इस प्रश्नावली का जवाब देने के लिए लोगों को 45 दिनों का वक्त दिया गया है। इसके आधार पर आयोग अपना प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजेगा।क्या हैं ये प्रथाएं जो समाज के कुछ हिस्सों में चली आ रही हैं?
पॉलीगेमी - बहुपत्नी प्रथा
वर्ष 1860 में भारतीय दंड विधान की धारा 494 और 495 के तहत ईसाइयों में पॉलीगेमी को प्रतिबंधित किया गया था और 1955 में हिन्दू मैरिज एक्ट में उन हिंदुओं के लिए दूसरी शादी को गैर कानूनी करार दिया गया जिनकी पत्नी जीवित हो। 1956 में इस कानून को गोवा के हिंदुओं के अलावा सब पर लागू कर दिया गया। मुसलमानों को चार शादियां करने की छूट दी गयी क्योंकि उनके लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ था। लेकिन हिंदुओं में भी पॉलीगेमी का चलन काफी है। सिविल मैरिज एक्ट के तहत की गयी शादियों में सभी समुदाय के लोगों के लिए पॉलीगेमी गैर कानूनी है।
महाभारत के मुताबिक इसी इलाके में पांडवों का पडाव रहा
पोलियेंडरी (बहु-पति प्रथा) -
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पोलियेंडरी (बहु-पति प्रथा) -
बहुपति प्रथा का चलन वैसे तो पूरी तरह से खत्म हो चुका है। फिर भी कुछ सुदूर इलाके ऐसे हैं जहां से कभी कभी इसके प्रचलन की खबर आती रहती है। इस प्रथा का प्रचलन ज्यादातर हिमाचल प्रदेश के किन्नौर में ही हुआ करता था जो तिब्बत के पास भारत-चीन सीमा के आस-पास का इलाका है। कई लोगों का मानना है कि महाभारत के मुताबिक इसी इलाके में पांडवों का पडाव रहा।
इसीलिए कहा जाता है कि बहुपति प्रथा का चलन यहां रहा है। इसके अलावा इस प्रथा को दक्षिण भारत में मालाबार के इज्हावास, त्रावनकोर के नायरों और नीलगिरी के टोडास जनजाति में भी देखा गया है। विधि आयोग की प्रश्नावली में पोलियेंडरी प्रथा के बारे में भी सुझाव मांगे गए हैं।
मुतआ निकाह
इसका प्रचलन ज्यादातर ईरान में रहा है जहां मुसलमानों के शिया पंथ के लोग रहते हैं। ये मर्द और औरत के बीच एक तरह का अल्पकालिक समझौता है जिसकी अवधि दो या तीन महीनों की होती है। अब ईरान में भी यह खत्म होने के कगार पर है। भारत में शिया समुदाय में इसका प्रचलन नहीं के बराबर है।
चिन्ना वीडु यानी छोटा घर का संबंध मूल रूप से दूसरे विवाह से जुडा हुआ है
चिन्ना वीडु
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चिन्ना वीडु
चिन्ना वीडु यानी छोटा घर का संबंध मूल रूप से दूसरे विवाह से जुडा हुआ है। इसे कभी तमिलनाडु के समाज में मान्यता मिली हुई थी। यहां तक कि एक बडे राजनेता ने भी एक पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह किया। बीबीसी तमिल सेवा के संपादक थिरुमलाई मणिवन्नन के अनुसार तमिलनाडु में इस प्रथा को बडी सामाजिक बुराई के तौर पर देखा जाने लगा है। और अब ये पूरी तरह बंद है।
मैत्री करार
ये प्रथा गुजरात की है। इसे स्थानीय स्तर पर कानूनी मान्यता भी मिली हुई है क्योंकि इस 'लिखित करार' का अनुमोदन मजिस्ट्रेट ही करता है। इसमें पुरुष हमेशा शादीशुदा ही होता है। यही कारण है कि ये आज भी जारी है। मैत्री करार यानी दो वयस्कों के बीच एक तरह का समझौता जिसे मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में लिखित तौर पर तय किया जाता है। ये मर्द और औरत के बीच एक तरह का 'लिव-इन रिलेशनशिप' है।
इसीलिए इसे 'मैत्री करार' कहा जाता है। गुजरात में सभी जानते हैं कि कई नामी-गिरामी लोग इस तरह के रिश्ते में रह रहे हैं। ये प्रथा मूलतः विवाहित पुरुष और पत्नी के अलावा किसी दूसरी महिला मित्र के साथ रहने को सामजिक मान्यता देने के लिए एक ढाल का काम करती रही है।