सरकार की योजना सावरकर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने की है। शिवसेना सावरकर को हिंदुत्व का आईकॉन मानती है तो कांग्रेस-शिवसेना द्विराष्ट्रवाद सिद्घांत का जनक। जाहिर तौर पर सरकार अगर इस आशय का घोषणा करती है तो कांग्रेस-एनसीपी के साथ-साथ शिवसेना का उलझन बढ़ेगा।
कांग्रेस-एनसीपी के पास इस घोषणा के विरोध केअलावा कोई चारा नहीं बचेगा। जबकि शिवसेना की चुप्पी से यह संदेश जाएगा कि उसने हिंदुत्व की राजनीति से किनारा कर लिया है।
अपनों के बीच भी बढ़ रही कांग्रेस की उलझन
शिवसेना के साथ केसवाल पर कांग्रेस की अपनों के बीच भी उलझन बढ़ रही है। नागरिकता कानून केबाद सावरकर केसवाल पर बसपा-एआईएमआईएम जैसे दल कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।
केरल जहां अल्पसंख्यक समुदाय की उल्लेखनीय संख्या है और पार्टी वहां एलडीएफ से सत्ता छीनने की कोशिशों में लगी है, वहां भी इसके नकारात्मक संदेश जा सकते हैं।