पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के एक बेहद करीबी सूत्र के मुताबिक सहमति यहां तक बन गई थी कि अगर जेवीएम आठ से दस सीटें जीत लेता है तो जरूरत पड़ने पर बाबूलाल मरांडी के दल का भाजपा में विलय कराकर मरांडी को ही मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा। लेकिन मतदान के तीसरे दौर के बाद से भाजपा रणनीतिकारों का आत्मविश्वास डगमगा गया।
उन्हें लगने लगा कि अगर आगे के दो दौर का मतदान भी ऐसा ही रहा तो भाजपा 20 से 25 सीटों के बीच ही सिमट जाएगी और तब उसके लिए बहुमत जुटाना बेहद कठिन होगा। इसलिए भाजपा के कुछ नेताओं ने झामुमो में भाजपा के प्रति नरम रहने वाले अपने मित्रों के जरिए बातचीत शुरू कर दी थी। जरूरत पड़ने पर झामुमो को बिना शर्त समर्थन देकर झामुमो भाजपा सरकार बनाने का प्रस्ताव भी दे दिया था।
झामुमो में भाजपा समर्थक नेताओं ने इसके लिए हेमंत सोरेन और शिबू सोरेन को मनाने की कोशिश भी की, लेकिन शिबू सोरेन ने सारा फैसला बेटे हेमंत पर छोड़ दिया और हेमंत इसके लिए तैयार नहीं थे। उनका कहना था यह राजनीतिक धोखाधड़ी होगी और इससे उनकी अपनी विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी। लेकिन फिर भी इसे जरूरत पड़ने पर अंतिम विकल्प के तौर पर अपनाने की सहमति बन गई थी।
बताया जाता है कि जब मतगणना चल रही थी और लग रहा था कि झामुमो कांग्रेस राजद गठबंधन और भाजपा व अन्य के बीच कांटे की टक्कर हो सकती है और विधानसभा त्रिशंकु हो जाएगी, तब कांग्रेस के कुछ नेताओं ने मीडिया में यह बयान देना शुरू कर दिया कि उनकी बाबूलाल मरांडी से बात हो रही है और कांग्रेस सरकार बनाने के लायक समर्थन जुटा लेगी।
कांग्रेस नेताओं के इस बयान को झामुमो के नेताओं ने कांग्रेस द्वारा मरांडी के साथ अपनी खिचड़ी अलग पकाने की शुरुआत जैसा माना और उन्हें यह बयान नागवार गुजरा। हेमंत सोरेने के करीबी लोगों ने कांग्रेस नेतृत्व में अपने संपर्कों के जरिए ये बात सोनिया-राहुल तक पहुंचाई और तत्काल रांची में मौजूद कांग्रेस नेताओं को संयम बरतने और संतुलित बयान देने के निर्देश आ गए।
डैमेज कंट्रोल के लिए कांग्रेस के तात्कालिक झारखंड प्रभारी आरपीएन सिंह ने मीडिया में आकर बयान दिया कि हेमंत सोरेन सोरेने ही कांग्रेस-झामुमो-राजद गठबंधन के नेता हैं और वही मुख्यमंत्री होंगे। समर्थन जुटाने के लिए जो भी रणनीति अपनाई जाएगी मिलजुलकर उसका फैसला होगा। इससे बात बिगड़ने से पहले ही संभल गई और झामुमो के भाजपा समर्थक नेताओं व उनके साथ गठबंधन की संभावना तलाशते भाजपा रणनीतिकारों की चाल मंद हो गई।
इसके बाद जब नतीजों में झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन को 47 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत और 30 सीटों के साथ झामुमो अकेले सबसे बड़ा दल बनकर आ गया तो तस्वीर लगभग साफ हो गई। लेकिन महागठबंधन से झामुमो को अलग करने की कोशिशें पूरी तरह थमी नहीं थीं।
इस बीच राज्यपाल से मिलकर हेमंत ने सरकार बनाने का न्यौता ले लिया। लेकिन कांग्रेस के कुछ नेताओं ने उपमुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष के पद और कम से काम पांच मंत्री पद की बात मीडिया में शुरू कर दी। भाजपा के रणनीतिकार फिर सक्रिय हुए और झामुमो के भाजपा समर्थक कुछ नेताओं ने फिर दबाव बनाना शुरू कर दिया।
तर्क दिया गया कि अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा है कांग्रेस-राजद को छोड़कर सीधे भाजपा से हाथ मिलाकर 55 विधायकों के समर्थन के साथ पूरे पांच साल सरकार चलाई जाए। साथ ही प्रस्ताव यह भी दिया गया कि अप्रैल 2020 में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव में झामुमो-भाजपा एक-एक सीट जीत लेंगे और झामुमो को केंद्र सरकार में भी हिस्सेदारी दी जा सकती है।
लेकिन इधर हेमंत सोरेन के गले यह बात नहीं उतरी और उन्होंने फिर अपने संपर्क सूत्रों के जरिए सोनिया-राहुल के यहां संदेश पहुंचाया कि कांग्रेस नेता भ्रम न फैलाएं और दबाव की राजनीति न करें। कांग्रेस के हितों और सम्मान के संरक्षण की जिम्मेदारी उन पर छोड़ दें।
इसके बाद जब दिल्ली से सकारात्मक संकेत मिले तो हेमंत दिल्ली पहुंचे और उन्होंने सोनिया गांधी और राहुल गांधी से यही बात कही। सूत्रों के अनुसार सोनिया ने हेमंत को आश्वस्त किया और कांग्रेस के महासचिव केसी वेणुगोपाल को सरकार गठन की प्रक्रिया पर बातचीत के लिए अधिकृत कर दिया।
सोनिया ने हेमंत से कहा कि आप सीधे वेणुगोपाल और राहुल गांधी से बात करिए वही फैसला करेंगे। इसके बाद हेमंत ने वेणुगोपाल से मिलकर सुझाव दिया कि फिलहाल मुख्यमंत्री के साथ एक मंत्री कांग्रेस का शपथ ले। बाकी सत्ता की हिस्सेदारी बाद में मिल बैठकर कर ली जाएगी। हालांकि वेणुगोपाल ने शुरू में सबकुछ तुरंत तय करना चाहा, लेकिन बाद में वह भी मान गए।
बताया जाता है कि शपथ ग्रहण से एक दिन पहले कांग्रेस की तरफ से रामेश्वर उरांव का नाम मंत्री पद के लिए आ गया। तब हेमंत ने कांग्रेस नेताओं से कहा कि दोनों ही आदिवासी नेताओं के शपथ लेने से राज्य में बेहद गलत संदेश जाएगा और भाजपा इसे मुद्दा बनाकर प्रचार शुरू कर देगी।
इसलिए कांग्रेस एक गैर आदिवासी का नाम भी दे, साथ ही राजद के एक मात्र विधायक को भी शपथ कराकर सामाजिक समीकरण सही करने चाहिए। इस पर भी जब कांग्रेस नेताओं ने ना नुकुर की तो फिर हेमंत सोरेने ने सोनिया गांधी से बात की। सोनिया ने कहा कि राहुल असम से लौट रहे हैं उनके आते ही इस मसले पर फैसला लिया जाएगा।
रात में राहुल गांधी दिल्ली लौटे और उनकी कांग्रेस अध्यक्ष से बात हुई और इसके बाद कांग्रेस विधायक दल के नेता और पाकुड़ से विधायक आलमगीर आलम का नाम कांग्रेस की तरफ से आया। साथ ही चतरा से राजद विधायक सत्यानंद भोक्ता को भी शपथ दिलाने पर सहमति बनी।
इस तरह महागठबंधन ने अपने संयुक्त जनाधार गैर ईसाई आदिवासी हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री, ईसाई आदिवासी रामेश्वर उरांव और दलित सत्यानंत भोक्ता व मुस्लिम आलमगीर आलम को मंत्री बनाकर सकारात्मक संदेश दे दिया।
साथ ही हेमंत सोरेन और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की समझदारी से भाजपा महाराष्ट्र का हिसाब झारखंड में चुकता नहीं कर सकी। वैसे सूत्रों के मुताबिक भाजपा के रणनीतिकार अभी सिर्फ पीछे हटे हैं, लेकिन उन्होंने पूरी तरह हार नहीं मानी है। उन्हें उम्मीद है जल्दी ही कांग्रेस और झामुमो में सत्ता के बंटवारे को लेकर खींचतान होगी और जैसे ही कोई सही मौका आएगा वो अपना दांव फिर चलेंगे।
भाजपा के एक नेता के मुताबिक कर्नाटक में भी बड़े जोशोखरोश से कांग्रेस जद(एस) ने सरकार बना ली थी लेकिन आखिरकार उस सरकार का क्या हश्र हुआ। सबके सामने है। वहीं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बेहद करीबी झामुमो के एक रणनीतिकार का कहना है कि भाजपा वाले सिर्फ दिवा स्वप्न देख रहे हैं।
कर्नाटक में कांग्रेस जद(एस) एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़े थे और उनके नेताओं व कार्यकर्ताओं के अंतर्विरोध खत्म नहीं हुए थे। झारखंड में झामुमो-कांग्रेस-राजद मिलकर चुनाल लड़े और हेमंत सोरेन के नेतृत्व पर सबको भरोसा है। महागठबंधन की सरकार पूरे पांच साल चलेगी।