जैसा कि हमने पिछले किस्से में कहा था कांग्रेस के सामने 1957 के चुनाव नतीजों ने कुछ नई चुनौतियों के द्वार खोल दिए थे। ये चुनौती उसे दक्षिण और पूर्वी भारत से मिली थी। पश्चिम से आई खबरों ने भी नेहरू की पार्टी को नई चुनौतियों का आभास करा दिया था। आज के चुनावी किस्से में इन्हीं चुनौतियों की बात करेंगे।
पूरब में उड़ीसा जिसे अब ओडिशा कहते हैं तो पश्चिम में बंबई प्रांत में कांग्रेस की मुश्किलों ने दस्तक दी तो दक्षिण में तमिलनाडु से केरल ने हवा के बदलते रुख का एहसास करा दिया। उड़ीसा में कांग्रेस को गणतंत्र परिषद से चुनौती मिली। स्थानीय जमींदारों के इस समूह ने वामपंथी पार्टियों के साथ मिलकर कांग्रेस को 20 लोकसभा सीटों वाले राज्य में महज सात सीट पर समेट दिया।
इसी तरह बंबई प्रांत की 66 सीटों में से कांग्रेस के खाते में 38 सीटें ही गईं। यहां कांग्रेस को हुए नुकसान के पीछे संयुक्त महाराष्ट्र समिति और महागुजरात परिषद जैसी पार्टियों को माना गया। ये दोनों दल अपने-अपने लिए अलग राज्य की मांग कर रहे थे।