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चुनावी किस्से: कैसे बनी देश की पहली गैर कांग्रेसी सरकार? शास्त्री-मोरारजी से अटल तक पहली बार पहुंचे लोकसभा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जयदेव सिंह Updated Tue, 12 Mar 2024 03:32 PM IST

सार

चुनावी किस्से: 1957 के चुनाव में कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती दक्षिण में थी। यहां कांग्रेस के खिलाफ डीएमके के रूप में एक क्षेत्रीय चुनौती पनप रही थी। चुनावी किस्से की इस कड़ी में जानते हैं 1957 के चुनाव में क्या हुआ...
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जवाहर लाल नेहरू - फोटो : AMAR UJALA
जैसा कि हमने पिछले किस्से में कहा था कांग्रेस के सामने 1957 के चुनाव नतीजों ने कुछ नई चुनौतियों के द्वार खोल दिए थे। ये चुनौती उसे दक्षिण और पूर्वी भारत से मिली थी। पश्चिम से आई खबरों ने भी नेहरू की पार्टी को नई चुनौतियों का आभास करा दिया था। आज के चुनावी किस्से में इन्हीं चुनौतियों की बात करेंगे। 

पूरब में उड़ीसा जिसे अब ओडिशा कहते हैं तो पश्चिम में बंबई प्रांत में कांग्रेस की मुश्किलों ने दस्तक दी तो दक्षिण में तमिलनाडु से केरल ने हवा के बदलते रुख का एहसास करा दिया। उड़ीसा में कांग्रेस को गणतंत्र परिषद से चुनौती मिली। स्थानीय जमींदारों के इस समूह ने वामपंथी पार्टियों के साथ मिलकर कांग्रेस को 20 लोकसभा सीटों वाले राज्य में महज सात सीट पर समेट दिया। 


इसी तरह बंबई प्रांत की 66 सीटों में से कांग्रेस के खाते में 38 सीटें ही गईं। यहां कांग्रेस को हुए नुकसान के पीछे संयुक्त महाराष्ट्र समिति और महागुजरात परिषद जैसी पार्टियों को माना गया। ये दोनों दल अपने-अपने लिए अलग राज्य की मांग कर रहे थे। 

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जवाहर लाल नेहरू - फोटो : AMAR UJALA
जैसा कि हमने पिछले किस्से में कहा था कांग्रेस के सामने 1957 के चुनाव नतीजों ने कुछ नई चुनौतियों के द्वार खोल दिए थे। ये चुनौती उसे दक्षिण और पूर्वी भारत से मिली थी। पश्चिम से आई खबरों ने भी नेहरू की पार्टी को नई चुनौतियों का आभास करा दिया था। आज के चुनावी किस्से में इन्हीं चुनौतियों की बात करेंगे। 

पूरब में उड़ीसा जिसे अब ओडिशा कहते हैं तो पश्चिम में बंबई प्रांत में कांग्रेस की मुश्किलों ने दस्तक दी तो दक्षिण में तमिलनाडु से केरल ने हवा के बदलते रुख का एहसास करा दिया। उड़ीसा में कांग्रेस को गणतंत्र परिषद से चुनौती मिली। स्थानीय जमींदारों के इस समूह ने वामपंथी पार्टियों के साथ मिलकर कांग्रेस को 20 लोकसभा सीटों वाले राज्य में महज सात सीट पर समेट दिया। 

इसी तरह बंबई प्रांत की 66 सीटों में से कांग्रेस के खाते में 38 सीटें ही गईं। यहां कांग्रेस को हुए नुकसान के पीछे संयुक्त महाराष्ट्र समिति और महागुजरात परिषद जैसी पार्टियों को माना गया। ये दोनों दल अपने-अपने लिए अलग राज्य की मांग कर रहे थे। 

1957 के चुनाव में दक्षिण में कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती 
अब बात दक्षिण की, जहां कांग्रेस सबसे बड़ी चुनौती का सामना करने जा रही थी। पहली चुनौती मद्रास से थी। यहां भी कांग्रेस के खिलाफ एक क्षेत्रीय चुनौती पनप रही थी। यह चुनौती द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके के शक्ल में सामने थी। ई. वी. रामास्वामी नायकर के द्रविड़ आंदोलन से निकली इस पार्टी का गठन उनके ही शिष्य रहे सीएन अन्नादुरई ने किया था। 

पेरियार के नाम से मशहूर ई.वी. रामास्वामी की पहचान राजनीति, संस्कृति और धर्मिक क्षेत्र में उत्तर भारतीयों के वर्चस्व के विरोधी के रूप में थी। पेरियार ने दक्षिण भारत में द्रविड़नाडु के नाम से अलग देश की मांग की थी। उनके पूर्व शिष्य सीएन अन्नादुरई ने पेरियार से मतभेद के बाद डीएमके की स्थापना की। अन्नादुरई ने संसदीय राजनीति द्वारा पेरियार की अलगाववादी मांग को आगे बढ़ाने की कोशिश की। 1957 का चुनाव इस पार्टी का पहला चुनाव था। अपने पहले ही चुनाव में इस पार्टी को सीटें भले कम मिलीं, लेकिन इस पार्टी को मिली सफलता एक बड़ी चिंता की तौर पर उभरी। इसका कारण इस पार्टी की मांग थी। यह पार्टी भाषा और नस्ल के आधार पर अलग राज्य की नहीं बल्कि अलग देश की मांग कर रही थी। हालांकि, 1962 के भारत-चीन युद्ध और राष्ट्रीय राजनीति के बदले परिदृश्य के बीच डीएमके ने स्वतंत्र द्रविड़नाडु की मांग को छोड़ दिया था। यही डीएमके इस वक्त भी तमिलनाडु की सत्ता में है। 

देश के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री ईएमएस नंबूदरीपाद - फोटो : CPI(M) WEST BENGAL
कांग्रेस को केरल में बड़ा झटका लगा
तमिलनाडु के बाद चलते हैं केरल। 1957 के चुनाव में कांग्रेस को सबसे तगड़ा झटका देश के दक्षिणी छोर पर स्थित इसी राज्य से लगा। यहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई। चुनौती भी ऐसी कि इस पार्टी ने कांग्रेस को राज्य की सत्ता से बाहर कर दिया। इसके साथ ही आजादी के 10 साल बाद केरल वह पहला राज्य बना जहां गैर कांग्रेसी सरकार सत्ता में आई। लोकसभा के साथ कराए गए राज्य विधानसभा चुनाव में लेफ्ट को केरल की 126 में से 60 सीटों पर जीत मिली। पांच निर्दलीय विधायकों के समर्थन से वाम दलों ने बहुमत भी हासिल कर लिया और ईएमएस नंबूदरीपाद देश के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। 

जवाहर लाल नेहरू - फोटो : Election Commission of India
केरल में विधानसभा के चुनाव हुए
केरल की 18 में से नौ लोकसभा सीटें भी कम्युनिस्ट पार्टी के खाते में गईं। वहीं, कांग्रेस को महज 6 सीट ही हाथ लगी। कम्युनिस्ट विचाराधारा की किसी बड़े देश के बड़े राज्य के चुनाव में यह पहली जीत थी। शीतयुद्ध की ओर बढ़ती दुनिया के लिए यह नतीजे कई सवाल भी लेकर आए थे। कई विवादों के बीच केरल की यह गैर कांग्रेसी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। महज दो साल बाद ही ईएमएस नंबूदरीपाद सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। 1960 में राज्य में नए सिरे से विधानसभा के चुनाव हुए। इन चुनावों में वाम दलों को बहुत बड़ी हार मिली। कांग्रेस ने इन चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग से गठबंधन कर लिया। इस गठबंधन के लिए खुद नेहरू ने जमकर प्रचार किया। ये चुनाव लोकतंत्र और साम्यवाद में से किसी एक को चुनने का चुनाव बन गए। चुनाव के दौरान रिकॉर्ड 84 फीसदी मतदान हुआ। सोशलिस्ट पार्टी और कांग्रेस गठबंधन ने बड़ी जीत दर्ज की। कांग्रेस को 60 सीटें मिलीं तो उसके सहयोगी दलों ने 31 सीट पर जीत दर्ज की। वाम दल महज 26 सीटों पर सिमट गए। नतीजों के बाद एक और दिलचस्प बात हुई। 127 सीट वाले सदन में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस थी, लेकिन मुख्यमंत्री सोशलिस्ट पार्टी के पीए थनुपिल्लई बने। 

अटल बिहारी वाजपेयी - फोटो : BJP
...यह युवा एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा
1957 के चुनाव में ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार जनसंघ के टिकट पर संसद पहुंचे। वाजपेयी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से चुनाव जीतकर सांसद बने थे। प्रधानमंत्री नेहरू उनके भाषण कला के इतने मुरीद हुए कि कह डाला कि यह युवा एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा। पंडित नेहरू की यह बात सही साबित हुई और 39 साल बाद 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। पूर्व प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई भी इसी चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीतकर पहली बार सांसद बने थे। अपना पहला चुनाव कांग्रेस के टिकट पर जीते मोरार जी 1977 में देश के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। इसी चुनाव में एक और नेता को पहली बार सांसद बनने का मौका मिला जो बाद में देश के प्रधानमंत्री बने। वो थे देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री। शास्त्री इलाहाबाद सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे।

यहां पढ़ें सभी चुनावी किस्से: 
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