रामविलास के सपने को ही आगे बढ़ा रहे थे चिराग
दरअसल, चिराग पासवान और उनके चाचा पशुपति नाथ पारस के बीच यह पूरा विवाद बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान पैदा हुआ। चिराग पासवान पार्टी को अकेले चुनाव में लड़ाने के पक्षधर थे, जबकि अन्य नेताओं का कहना था कि एनडीए खेमे में रहते हुए आगे बढ़ा जाए। चिराग के निर्णय का कोई उस समय विरोध नहीं कर सका, और पार्टी ने अपने दम पर चुनाव लड़ा। उसे इसका नुकसान हुआ और पार्टी शून्य पर सिमट कर रह गई।
लेकिन इस करारी हार के बाद भी चिराग ने लगभग सात फीसदी वोट हासिल कर यह साबित कर दिया कि बिहार के महादलित समुदाय पर उनकी अच्छी खासी पकड़ है। इतने वोट बैंक के बलबूते वे बिहार की राजनीति में एक प्रभावशाली दखल रखेंगे और उन्हें खारिज करना संभव नहीं होगा। पार्टी नेताओं का दावा है कि अगर पार्टी में दो फाड़ होने की परिस्थिति बनती है तो भी चिराग पासवान आत्मसमर्पण नहीं करेंगे। वे अपने दम पर रामविलास पासवान की विरासत को आगे बढ़ाएंगे। जिस तरह से बिहार की जनता में उनकी लोकप्रियता है, उसे देखते हुए अपनी अगली पारी के लिए वे तैयार हैं।
दरअसल, रामविलास पासवान ने जब लोजपा की नींव रखी थी, एक समय उसके दो दर्जन से ज्यादा विधायक चुनकर आते थे। (हालांकि, बाद में पार्टी में टूट हो गई और विधायक सत्तादल से जा मिले)। इसके बाद के चुनावों में रामविलास पासवान को कभी भाजपा के साथ समझौता कर चुनाव लड़ा तो कभी जेडीयू के साथ। लेकिन इस कोशिश में रामविलास पासवान का कद तो बना रहा, लेकिन उनकी पार्टी का कद लगातार छोटा होता गया। एक समय उनकी पार्टी का कोई विधायक बिहार विधानसभा में नहीं रह गया।
महादलित समुदाय में युवा तुर्क बनकर उभरे रामविलास पासवान ने परिस्थितियों के साथ समझौता तो जरूर कर लिया, लेकिन उनके दिल में यह टीस हमेशा बनी रही कि वे पार्टी को उस ऊंचाई तक नहीं पहुंचा पाए जहां तक उसे ले जाना चाहते थे। यही कारण है कि जब 2019 में उन्होंने चिराग पासवान को पार्टी का अध्यक्ष पद सौंपा, उसी समय उन्हें पार्टी का आधार बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी।
पार्टी नेता बताते हैं कि 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा को समर्थन चिराग पासवान के कहने के बाद ही लिया गया था जसके बाद पार्टी के छह सांसद विजयी होकर लोकसभा पहुंचे थे। बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव में अकेले जाने का फैसला पार्टी के जनाधार को बढ़ाने की राजनीति से ही किया गया था, और यह चिराग की नासमझी नहीं, बल्कि रामविलास पासवान के सपने को जमीन पर उतारने की कोशिश ही थी।
इस चुनाव में पार्टी के शून्य पर आने की आलोचना अवश्य की जा सकती है, लेकिन इस बात से कत्तई इनकार नहीं किया जा सकता कि राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी जैसे मजबूत दलों के बीच भी पार्टी ने मजबूती से अपना पांव जमाए रखा और सात फीसदी वोट हासिल करने में सफलता हासिल की।
लोजपा नेताओं को लगता है कि अगर उपेन्द्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी जैसे नेता दो फीसदी वोट बैंक से भी कम हासिल कर बिहार की राजनीति में प्रासंगिक बने रह सकते हैं तो चिराग को खारिज कर पाना किसी के लिए संभव नहीं होगा। यही सोच चिराग खेमे की ताकत है और इसी के बूते वे संघर्ष कर रहे हैं।