भारत की तरह चीन का मीडिया सतरंगा नहीं है। बल्कि अपने देश और सरकार के लिए सूचनाएं, आंकड़े और जानकारियां जुटाने तथा जनमत को प्रभावित करने का एक बड़ा हथियार है, जिसे दुनिया के प्रचार युद्ध में चीन बड़ी होशियारी के साथ सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर रहा है। हालाकि माओ युग के चीन में वहां सरकारी समाचार पत्र रेन मिन रिपाओ यानी पीपुल्स डेली और समाचार एजेंसी शिन्हुआ का ही एकाधिकार था, जो अब पूरी तरह टूट गया है।
चीन में अंग्रेजी अखबार और चैनल्स की भरमार
बीजिंग से लेकर शंघाई तक चीन में चीनी भाषा के साथ अंग्रेजी में भी कई अखबार, टीवी चैनल्स और डिजिटल न्यूज वेबसाइट्स की भरमार है। चीनी मीडिया का व्यवसायिक मॉडल भी बेहद दिलचस्प है। आमतौर पर कम्युनिस्ट व्यवस्था में सिर्फ सरकारी मीडिया ही होता है, जो सरकार के खिलाफ लिखने की बजाय सरकारी नीतियों के प्रचार प्रसार का ही काम करता है। जबकि लोकतांत्रिक देशों में सरकारी मीडिया के साथ निजी मीडिया भी होता है, जिसे अपनी संपादकीय नीति तय करने की पूरी आजादी होती है और सरकार की आलोचना करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त होता है।
चीन में पिछले 10 सालों में काफी कुछ बदला
लंबे समय तक चीन में भी यही रहा और सिर्फ गिने-चुने सरकारी अखबार, पत्रिका, टीवी, रेडियो और एजेंसी ही मीडिया के नाम पर थे। लेकिन पिछले दस वर्षों के दौरान जबसे पूरी दुनिया में सूचना तकनीक और सोशल मीडिया की इंटरनेट क्रांति हुई है, तभी से वहां चीनी भाषा के अलावा अंग्रेजी में कई अखबार, टीवी चैनल, एफएम रेडियो, डिजिटल न्यूज पोर्टल शुरू किए गए हैं।
पर्दे के पीछे से चीन देता है मदद
जहां पुराने और सीधे सरकारी नियंत्रण वाले मीडिया ने खुद को आधुनिक तकनीक से लैस करके नई पीढ़ी के हिसाब से खुद को बदला है, वहीं नए शुरू हुए कई मीडिया समूह ऐसे भी हैं, जो सीधे तौर पर सरकारी नियंत्रण में नहीं हैं, और उनका संचालन व नियंत्रण स्वतंत्र व्यक्तियों और समूहों के हाथ में है। लेकिन किसी न किसी तरीके से पर्दे के पीछे से उन्हें सरकारी सहायता मिलती है। कुछेक को चीन की बड़ी सरकारी कंपनियों से आर्थिक मदद मिलती है, तो कुछ को सरकार की तमाम योजनाओं के जरिए लाभार्थी बनाया जाता है।
मीडिया पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण
सरकार, उद्योग समूह और सामाजिक संगठन मीडिया समूहों के जरिए सूचनाएं एकत्र करने, जनमत सर्वेक्षण, नीतियों पर लोगों की राय जानने, उत्पादों और ब्रांडों को लोकप्रिय बनाने जैसे काम लेते हैं और बदले में मीडिया समूह को आर्थिक भुगतान किया जाता है। इसके जरिए इन मीडिया समूहों की सरकार पर निर्भरता बनी रहती है और अप्रत्यक्ष तौर पर नियंत्रण भी रहता है। इन मीडिया समूहों का व्यवसायिक मॉडल पूरी तरह से सरकार और सामाजिक समूहों के वित्तीय सहयोग पर टिका हुआ है और सामाजिक समूह भी किसी न किसी रूप से सरकार से जुड़े हुए हैं।
कॉपीराइट और सरकारी योजनाओं से कमाई
एक बेहद दिलचस्प आर्थिक स्रोत यह भी है कि मीडिया समूह अपनी खबरों, लेखों और दूसरी प्रकाशित सामग्री का कॉपीराइट रखते हैं और अगर सरकार, कोई कंपनी, कोई व्यक्ति या समूह इस विषय सामग्री का किसी भी तरह का उपयोग अपने हित में करता है तो उसके बदले में उसे संबंधित मीडिया समूह को धनराशि का भुगतान करना होता है। बीजिंग में प्रमुख अखबार चाइना डेली में एक भी विज्ञापन नही दिखा, लेकिन अखबार का शानदार दफ्तर, कर्मचारियों की संख्या आदि देखने के बाद जब अखबार के संपादकीय प्रमुख से व्यवसायिक मॉडल पूछा गया, तो उन्होंने कॉपीराइट और सरकारी योजनाओं को आय का मुख्य स्रोत बताया। अखबार के दफ्तर के लिए भवन भी सरकार ने ही मुहैया कराया है।
टाइगर हंट की भ्रष्टाचार से लड़ाई
शंघाई में प्रमुख न्यूज साईट पेपर.डॉट.सीएन के संपादकीय उप प्रमुख ली रांग ने बताया कि उनकी साइट का एक बेहद लोकप्रिय अभियान है टाइगर हंट। जिसमें स्थानीय स्तर पर शासन प्रशासन और सभी सरकारी विभागों संस्थानों में भ्रष्टाचार का पता लगाकर उसका पर्दाफाश करना होता है। न्यूज साइट ने भ्रष्टाचार के एसे कई मामलों की जानकारी दी जो टाईगर हंट के जरिए उजागर किए गए और दोषियों को कानून की गिरफ्त में लाया गया।
चीनी पत्रकारों से मिले भारतीय पत्रकार
चीन के सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबारों में पुराने पीपुल्स डेली के अलावा चाईना डेली, ग्लोबल टाइम्स प्रमुख अंग्रेजी अखबार हैं। जबकि डिजिटल न्यूज में चाइना डॉट कॉम डॉट सीएन, चाइना डॉट ओआरजी डॉट सीएन, चाईना मीडिया ग्रुप, शंघाई यूनाइटेड मीडिया ग्रुप, दि पेपर डॉट सीएन, ईस्ट डे डॉट कॉम और टीवी नल सीजीटीएन प्रमुख मीडिया समूह हैं। बीजिंग और शंघाई में इन मीडिया समूहों के दफ्तरों में जाने और उनके संपादकीय विभाग के कामकाज को देखने का अवसर भारतीय पत्रकारों को मिला। इस दौरान इन मीडिया समूहों में काम करने वाले पत्रकारों के साथ भी अनौपचारिक चर्चा और विचारों का आदान प्रदान हुआ।
भारत की तरह चीन में भी प्राइम टाएम लोकप्रिय
चीन के बेहद लोकप्रिय टीवी चैनल सीजीटीएन के प्राइम टाइम शो की मेजबान एंकर ल्यू शिन का कहना था कि भारत की ही तरह चीन में भी लोग टीवी समाचार चैनलों में प्राइम टाइम में समसामयिक विषयों पर होने वाली बहस को देखना पसंद करते हैं। इन दिनों चीन और अमेरिका के बीच जारी व्यापार युद्ध को लेकर चीनी मीडिया में खबरों की भरमार रहती है। सीजीटीएन में भी प्राइम टाइम का यह बेहद पसंदीदा मुद्दा है। ल्यू शिन की एक अमेरिकी महिला रेगन के साथ टीवी शो और फिर सोशल मीडिया में हुई जुबानी जंग चीन में बेहद चर्चित रही है।
खबरों के लिए पश्चिमी मीडिया के भरोसे न हों
भारत को लेकर ल्यू शिन का कहना है कि बजाय पश्चिमी मीडिया पर निर्भर रहने के भारतीय मीडिया और चीनी मीडिया को एक दूसरे से सीधे संवाद कर दोनों देशों की सूचनाएं और जानकारियां साझा करनी चाहिए। पश्चिमी मीडिया तथ्यों को अपने नजरिए से पेश करता है, जिससे दोनों देशों के बीच भ्रम पैदा होता है। ल्यू का मानना है कि नकारात्मक और विवादित मुद्दों को तूल देने की बजाय दोनों देशों की सकारात्मक खबरें और विकास की कहानियों को पेश किया जाना चाहिए।
हिंदी को लेकर चीन में काफी दिलचस्पी
चाइना मीडिया ग्रुप के हिंदी विभाग के निदेशक यांग यी फंग का सुझाव है कि भारतीय भाषाओं विशेषकर हिंदी को लेकर चीनी जनता की दिलचस्पी बढ़ रही है। इसलिए भारतीय हिंदी समाचार पत्रों के साथ चीनी मीडिया ग्रुप जैसे मीडिया समूह अगर सूचनाएं और जानकारी साझा करते हैं तो दोनों देशों के मीडिया को इसका फायदा होगा। चाइना मीडिया ग्रुप के दक्षिण एशिया विभाग के प्रमुख सुन जिंग ली का भी मानना है कि दोनों देशों के मीडिया समूह एक दूसरे से काफी कुछ सीख सकते हैं।
खत्म हो संवादहीनता
पीपुल्स डेली के अंतर्राष्ट्रीय समाचार विभाग के वरिष्ठ संपादक ल्यू चांग्हवा मानते हैं कि दशकों से दोनों देशों के मीडिया के बीच संवादहीनता ने दोनों देशो के बीच दूरी पैदा की और पश्चिमी स्रोतों से मिली जानकारियों और सूचनाओं ने भ्रम पैदा किया। इसलिए दोनों देशों के बीच मीडिया संबंध और मजबूत होने चाहिए।