एनएसजी पर भारत को धोखा दे चुका चीन अब मिसाइल टेक्नालॉजी कंट्रोल रिजीम में भारत की सदस्यता को पचा नहीं पा रहा है। चीन के लिए भारत की यह उपलब्धि इसलिए भी दोहरा झटका है क्योंकि उसे अपनी छलवादी नीतियों के कारण अभी तक इसमें प्रवेश करने में सफलता नहीं मिल सकी है।
अब अपनी इसी खीझ को चीनी मीडिया भारतीयों पर टीका टिप्पणी करके मिटा रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार चाइना सरकार के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स में लिखे एक लेख में भारतीयों को 'स्वकेंद्रीत और पाखंडी' बताया गया है।
चीन की बौखलाहट का आलम ये है कि पूरा का पूरा लेख भारतीयों के प्रति जहर और अभद्रता से भरा हुआ है। चीनी अखबार के अनुसार भारतीयों को राष्ट्रवाद समझ में नहीं आता और न ही उन्हें नैतिकता का कोई ज्ञान है। अखबार के अनुसार पश्चिम का अनुकरण भारतीय और खराब होते जा रहे हैं।
एनएसजी में विफलता पर चीन को दोष देने का आरोप
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लेख में एनएसजी में भारत की असफलता और उसके लिए किए गए भारत के जीतोड़ प्रयासों पर भी चर्चा की गई है। इसमें यह भी बताया गया है कि किस तरह भारतीय सरकार और मीडिया ने एनएसजी में विफलता के लिए चीन के विरोध को दोषी ठहराया है।
आश्चर्यजनक रूप से अखबार ने भारतीयों को राष्ट्रवाद और देशभक्ति का सबक लेने की बात कही है। अखबार ने भारत पर एनएसजी के लिए पश्चिम देशों की मनुहार का भी आरोप लगाया। बता दें कि अमेरिका, फ्रांस, कनाडा सहित सभी प्रमुख विकसित देश एनएसजी में भारत का समर्थन कर रहे थे।
लिखा गया है कि, भारत की महत्वाकांक्षा के पीछे अमेरिका ने सबसे ज्यादा प्रोत्साहन दिया.... अमेरिका ही पूरी दुनिया नहीं है। इसका समर्थन यह साबित नहीं करता कि भारत ने पूरा विश्व जीत लिया। यही भारत की उपेक्षा का सबसे प्रमुख तथ्य है।
भारतीयों को समझना होगा महाशक्तियों का खेल
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अखबार ने भारतीयों को विदेश नीति की और बेहतर समझ विकसित करने की ताकीद की, कहा असल में भारत और वाशिंगटन के रिश्तों में चीन को रोकना ही प्रमुख उद्देश्य है।
भारत के लोगों को समझना चाहिए कि दूसरों से कैसे बर्ताव किया जाए, अब वे चाहते हैं कि उनका देश एक बड़ी ताकत बन जाए लेकिन उन्हें यह भी समझना होगा कि बड़े ताकतें कैसे खेल खेलती हैं।
लेख में एनएसजी मुद्दे पर चीन के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि उसने नियमों का पालन किया, जोकि ये है कि एनएसजी में सिर्फ उन्हीं देशों को प्रवेश दिया जा सकता है जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए हों और भारत ने ऐसा नहीं किया। दस देशों ने इस मुद्दे पर भारत का विरोध किया।
भारत ने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किया है लेकिन वह एनएसजी में शामिल होने वाले सबसे उत्सुक देशों में से है। सियोल में होने वाली बैठक से पहले भारतीय मीडिया ने इस संबंध में बहुत ज्यादा संभावनाएं लगा ली थी। यहां तक कहा गया कि 48 में से 47 देशों ने भारत का समर्थन किया, केवल चीन ही भारत के विरोध में था।