सरकार के शीर्ष सूत्र के मुताबिक, चीन के लिए मुश्किलें तब शुरू हुईं जब उसके यहां स्थापित 200 अमेरिकी कंपनियों ने दूसरे देश में डेरा डालने का संकेत दिया। अमेरिका के अलावा दूसरे देशों की कंपनियों ने भी इसी राह पर चलने के संकेत दिए। मई में एक समय ऐसा भी आया जब अमेरिका की 200 कंपनियों ने भारत आने के संकेत दिए।
हालात का फायदा उठाने के लिए कई राज्यों ने अपने अपने श्रम कानूनों में अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक संशोधन किए। इसी दौरान केंद्र सरकार के स्तर पर लग्जमबर्ग से दोगुने आकर के लैंडपूल की तलाश शुरू हुई। इस दिशा में गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश में 4,61,589 हेक्टेयर भूमि की पहचान का काम भी शुरू हो गया।
भारत ने चीन छोड़ने वाली कंपनियों को अपने यहां बुलाने की योजना पर काम अप्रैल महीने में शुरू कर दिया। इस महीने के अंतिम हफ्ते में इस दिशा में सकारात्मक संदेश मिलने शुरू हुए। और यही वह समय था जब चीन ने एलएसी पर तनाव की स्थिति पैदा करनी शुरू कर दी। तनाव को बढ़ाने के लिए चीन की ओर से ऐसे दावे किए गए जो तथ्यात्मक तौर पर गलत थे। इसके अलावा इस दौरान दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने का कोई कारण नहीं था।
भारत को वॉर जोन के रूप में प्रचारित करने के लिए चीन ने पाकिस्तान और नेपाल को भी साधा। इस तथ्य की पुष्टि इससे भी होती है कि एलएसी पर चीन के साथ जारी तनाव के बीच पाकिस्तान एलओसी पर लगातार सीजफायर का उल्लंघन कर रहा है। नेपाल ने विवादित और तथ्यहीन तरीके से भारतीय भूभाग पर दावा जताने के बाद तनाव का संदेश देने के लिए बांधों के मरम्मत के कार्य पर रोक लगा दी है।