इस इनिशिएटिव के जरिये चीन का मकसद एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ना है। इसके एक सिरे पर वह पूर्वी एशिया के विकासशील देश को जोड़ना चाहता है तो दूसरी ओर विकसित यूरोपीय अर्थव्यवस्था को। बेल्ट का मतलब सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट से है। इसके तहत तीन स्थल मार्ग आते हैं। एक, चीन को मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक जोड़ने का रास्ता।
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दूसरा, चीन को मध्य और पश्चिम एशिया के जरिये फारस की खाड़ी से जोड़ने वाला रास्ता। तीसरा, चीन को दक्षिणपूर्वी, दक्षिण और हिंद महासागर से जोड़ने का रास्ता। रोड का मतलब 21वीं सदी के समुद्री रास्ते है जो चीन के तटीय शहरों और यूरोप के बीच कारोबार को बढ़ावा देने के लिए होगा। इसके लिए एक रास्ता दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर होगा।
चीन के लिए वन बेल्ट, वन रोड अहम क्यों?
लंबे तक ऊंची आर्थिक विकास दर के बाद चीन की अर्थव्यवस्था धीमी होती जा रही है। अब उसे अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था में तेजी का एक दौर लाना है। चीन की कंपनियों में भारी उत्पादन हो रहा है उनका माल खपाने के लिए उसे एक बड़ा बाजार चाहिए। वन बेल्ट वन रोड, चीन की इस रणनीति में बिल्कुल मुफीद बैठता है। वन बेल्ट वन रोड को चीनी आर्थिक डिप्लोमेसी का ब्लूप्रिंट माना जा रहा है। चीन इसके जरिये खुद को दुनिया के लिए दूसरी बार खोलना चाहता है।
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चीन पर वन बेल्ट, वन रोड परियोजना के क्या आर्थिक और राजनीतिक असर होंगे?
चीन की अर्थव्यवस्था पर इस पहल का सकारात्मक असर हो सकता है। पहला तो यह कि चीनी अर्थव्यवस्था की ज्यादा क्षमता का इस्तेमाल हो जाएगा क्योंकि चीन कई देशों में भारी निवेश करेगा। दूसरा, वह निम्न स्तर की मैन्यूफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी को एशियाई विकासशील और अफ्रीकी देशों में शिफ्ट कर अपने यहां हाई-स्टैंडर्ड टेक्नोलॉजी पर ध्यान देगा और अपनी क्षमता बढ़ाएगा। दूसरे देशों में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और निवेश से चीन अच्छी कमाई कर सकता है। इस रकम को वह मेड इन चाइना 2020 जैसी योजनाओं पर खर्च कर सकता है जो उसकी महत्वाकांक्षी पहल है।
जहां तक चीन की राजनीति पर इसका असर है तो यह कि इससे राष्ट्रपति शी जिनपिंग की स्थिति और मजबूत होगी। इसे उनकी विरासत नीति कही जा रही है। यानी चीन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने की नीति। यह अमेरिकी वर्चस्व के खिलाफ चीन को एक प्रमुख ताकत के तौर पर खड़ा करने की भी मजबूती है। आने वाले दिनों में दुनिया के देश चीन को एक प्रमुख शक्ति मानेंगे, इसकी यह तैयारी है। इसके साथ ही यह चीन को एशिया में सबसे बड़ी ताकत बनाने की कवायद है। कुल मिलाकर इससे चीन में मौजूदा नेतृत्व की स्थिति और मजबूत होगी और चीनी राष्ट्रवाद भी ताकतवर होगा।
भारत क्यों कर रहा है वन बेल्ट, वन रोड पहल का विरोध?
भारत-चीन संबंध (प्रतीकात्मक)
- फोटो : InShorts
पहली बात तो यह कि इस पहल की एक परियोजना चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कोरिडोर वन बेल्ट वन रोड प्रॉजेक्ट का एक अहम हिस्सा है- चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर। यह प्रोजेक्ट पीओके स्थित भारतीय इलाके गिलगित बाल्टिस्तान से गुजरेगा। गिलगित बाल्टिस्तान कानूनन भारतीय जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है। यह भारत के संप्रभुता का उल्लंघन है।
दूसरे चीन भले ही अपनी इस पहल का आर्थिक मकसद बता रहा हो और कह रहा हो कि इससे सहयोगी देशों की अर्थव्यवस्था और इन्फ्रास्ट्रक्चर को फायदा होगा। लेकिन मामला इतना सरल नहीं है। इस पहल के तहत बनने वाली चीनी परियोजनाओं का आर्थिक इस्तेमाल भी हो सकता है। जैसे हाल में श्रीलंका में दिखा, जहां कोलंबो में चीनी पनडुब्बी पहुंच गया। भारत को शक है कि चीन उसे घेरने की कोशिश कर रहा है। कुछ हद तक यह सही भी है।
क्यों अहम है बेल्ट रोड फोरम?
चीन में रविवार से दो दिनों का बेल्ट रोड फोरम शुरू हो रहा है। इसमें 29 देशों के राष्ट्र प्रमुख और विभिन्न देशों के 100 से ज्यादा मंत्री स्तरीय अधिकारी शामिल होंगे। अमेरिका भी प्रतिनिधि भेजेगा। रूसी राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन भी होंगे। भले ही यह बेल्ट रोड इनिशिएिटव को तेज करने पर चर्चा के लिए बुलाया गया हो। लेकिन यह एक तरह से यह चीन का शक्ति प्रदर्शन भी है। चीन दिखाना चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा देश चीन के बेल्ट रोड इनिशिएटिव में उसके साथ है।
चीन के नेता कहते हैं कि वन बेल्ट वन रोड यानी बेल्ट रोड इनिशिएटिव का मकसद आर्थिक है। काफी हद तक यह सच है लेकिन पूरा सच नहीं है। चीन की इस बड़ी पहल के राजनीतिक और कुछ हद तक रणनीतिक मकसद भी हैं। भारत चीन की इस पहल का विरोध कर रहा है क्योंकि बेल्ट रोड इनिशिएटिव से जुड़ी एक अहम परियोजना चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कोरिडोर पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरता है। भारत का कहना है इससे इसकी संप्रभुता पर आंच आएगी।
चीन ने भारत को बेल्ट रोड इनिशिएटिव में शामिल होने का न्योता दिया लेकि न उसने भागीदार बनने से इनकार कर दिया है। लेकिन हमारा मानना है कि भारत को बेल्ट रोड इनिशिएटिव का फायदा उठाना चाहिए। जब सत्तर साल में हमने पीओके को लेने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की तो अब इसे मुद्दा बना कर बेल्ट रोड इनिशिएटिव में हिस्सेदार बनने से इनकार करना कोई समझदारी का काम नहीं है।
दरअसल, भारत के लिए चीन बहुत बड़ा बाजार है। चीन अपनी अर्थव्यवस्था की ओवर-कैपिसिटी को एशिया और अफ्रीकी देशों में खपाना चाहता है। भारत को हर साल एक करोड़ से सवा करोड़ रोजगार पैदा करने की जरूरत है। आखिर यह कहां से आएगा? यह चीन से आएगा, अमेरिका से नहीं क्योंकि वह अपने मैन्यूफैक्चरिंग बेस को बाहर ले जाना चाहता है। वन बेल्ट वन रोड परियोजना के नाम पर चीन के उद्योगपतियों को भरपूर लोन मिल रहा है। जाहिर है कि अगर भारत इस इनशिएटिव में चीन का साथ देता है कि चीन उद्योग यहां काफी निवेश कर सकता है।
चीन की आबादी धीरे-धीरे उम्रदराज हो रही और वहां उद्योग की लागत भी बढ़ रही है। इसलिए चीन अपना मैन्यूफैक्चरिंग बेस बांग्लादेश, वियतनाम, पाकिस्तान और भारत जैसे देशों में शिफ्ट करना चाहता है। लेकिन चीन के लिए भारत का बाजार सबसे मुफीद साबित होगा, जहां बड़ी तादाद में नौजवान आबादी और स्किल भी। बिहार, यूपी के नौजवानों को चीन के मैन्यूफैक्चरिंग के विस्तार से सबसे ज्यादा फायदा होगा। अगर चीन बेल्ट रोड इनशिएटिव के जरिये सांस्कृतिक वर्चस्व लादने की कोशिश करता है तो इसका विरोध होना चाहिए।
वैसे भी विरोध करना चाहें तो कई मुद्दे हैं। लेकिन मेरा मानना है कि भारत को बेल्ट रोड इनिशिएटिव में भागीदार बनना चाहिए। इससे, चीन हमारा सपोर्ट करेगा। उसे धंधा चाहिए। चीन पाकिस्तान के ग्वादर से शिनजियांग तक माल लाने ले जाने का जी बात कर रहा है, वह व्यावहारिक नहीं है। पाकिस्तान में अधिकतर पीएसयू से जबरदस्ती इस इनिशिएटिव में शामिल होने को कहा जा रहा है। इससे उन्हें फायदा नहीं होना है। दूसरे पाकिस्तान में वह स्किल नहीं है, जिसकी चीन को जरूरत है। उसके लिए भारत के साथ कारोबार करना ज्यादा आसान है। इसीलिए भारत को वह इसमें शामिल करना चाहता है। भारत को इस पहलू पर गौर करना चाहिए कि यह हमारे लिए फायदे का सौदा है।