नेपाल में अपनी पकड़ मजबूत करने की मुहिम में चीन को मिली नाकामी से भारत ने राहत की सांस ली है। एड़ी चोटी का जोर लगाने के बावजूद चीन न तो सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) में विभाजन रोक पाया और न प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तथा असंतुष्ट धड़े के नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड को साध पाया।
एनसीपी में विभाजन के बाद अब वहां नए सिरे से चुनाव कराने के अलावा विकल्प नहीं बचा है। भारत भी चाहता था कि पड़ोसी मुल्क में नए सिरे से चुनाव हों।
ओली की ओर से प्रतिनिधि सभा भंग करने की सिफारिश और इस पर राष्ट्रपति की मुहर के बाद भारत असमंजस में था। इसकी वजह चीन की रणनीति थी। उसकी कोशिश थी कि पहले एनसीपी में विभाजन को रोका जाए।
इसके लिए चीन ने अपने नेपाल राजदूत को सक्रिय करने के अलावा उपमंत्री के नेतृत्व में उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजा था। चीन ने प्रचंड के नाम पर सहमति बनाने की कोशिश की। अपनी पसंद की सरकार बनाने के लिए चीनी प्रतिनिधि ने दूसरे दलों से संपर्क साधा लेकिन चीन न विभाजन टाल पाया और न प्रचंड के नेतृत्व में आमसहमति कायम करने में कामयाब रहा।
चुनाव हुए तो कम्युनिस्ट वोट बटेंगे
नए सियासी संकट के बीच भारत की मंशा थी कि वहां नए सिरे से चुनाव हों और इसमें भारत समर्थक ताकतों को जीत मिले। अब एनसीपी में विभाजन तय है। ऐसे में ओली और प्रचंड दोनों अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं। नेपाली कांग्रेस शुरू से चुनाव कराने की मांग कर रही है।
नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों का झुकाव चीन के पक्ष में रहा है। इसलिए जब नेपाल में अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों का दो साल पूर्व विलय हुआ तब भारत की परेशानी बढ़ी थी। अब ओली और प्रचंड अलग हो गए और कम्युनिस्ट पार्टी दो फाड़ हो गई है। अगर चुनाव हुए तो कम्युनिस्ट समर्थक वोट दो बंटेंगे।
ओली ने भी बदल दिया पाला
पीएम ओली शुरू में चीन के साथ मजबूती से खड़े थे। हालांकि प्रतिनिधि सभा भंग करने की सिफारिश के बाद चीन ने ओली से किनारा करने और उनकी जगह प्रचंड को आगे करने की रणनीति अपनाई। इस रणनीति के तहत चीन ने ओली और प्रचंड दोनों को मनाने की कोशिश की। इसके बाद ओली को किनारे कर प्रचंड के नाम पर आमसहमति बनाने की भी पूरी कोशिश की। चीन के इस नए रुख ने ओली को भी नाराज कर दिया।
जोर पकड़ सकती है राजशाही की मांग
नेपाल में लोकतंत्र बहाली के बावजूद सियासी अराजकता के कारण वहां राजशाही बहाल करने की मांग लगातार तेज हो रही है। आम चुनाव से पहले मांग और तेज बढ़ सकती है। वहां एक वर्ग लोकतांत्रिक व्यवस्था से ऊब गया है।
ऐसा इसलिए कि नेपाल में लोकतंत्र बहाली के बाद मतदाताओं ने अलग-अलग समय में अलग-अलग पार्टी और विचारधारा को जनादेश दिया है लेकिन इसके बावजूद वहां अराजकता कायम है।