पर्यावरण विशेषज्ञ रमेश पांडे कहते हैं इससे साफ जाहिर होता है कि चीन ने किस कदर खुद को आगे रखने के लिए सब कुछ दांव पर लगा रहा है। रमेश पांडे कहते हैं 5 साल पहले हुए पेरिस जलवायु समझौते के अनुसार इस दशक में हर साल तकरीबन 1 से 2 अरब मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन की कटौती बहुत जरूरी है। अगर हम ऐसा कर पाएंगे तभी पृथ्वी के तापमान की वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखा जा सकता है। लेकिन 2015 में हुए पेरिस समझौते के बाद कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने भी इस पर चिंता जताते हुए कहा कि अगर 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में प्रतिवर्ष 7.30 फ़ीसदी की कटौती हुई तो तापमान वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित रखा जा सकता है।
लॉकडाउन में कार्बन उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन पर पड़ने वाले प्रभाव को परखने वाले वैज्ञानिक केएल क्वेर्रे कहते हैं लॉकडाउन जलवायु परिवर्तन से निपटने का कोई तरीका नहीं है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि जैसे महामारी खत्म होगी उसके बाद कार्बन उत्सर्जन एक बार फिर से अपने चरम पर पहुंचने लगेगा। जलवायु परिवर्तन पर करीब से नजर रखने वाले पर्यावरणविद फिलिप चॉइस कहते हैं कि अगर कोरोना जैसी महामारी नहीं आई होती तो चीन जैसे कार्बन उत्सर्जन बड़े मुल्क अब तक फिजा में बहुत ज्यादा जहर घोल चुके होते। बावजूद इसके चीन ने कोई कसर नहीं छोड़ी। जब पूरी दुनिया में कार्बन उत्सर्जन कम हो रहा था तो चीन के द्वारा किया जाने वाला कार्बन उत्सर्जन कोरोना काल में भी सबसे ज्यादा था।