सर गंगाराम अस्पताल के मनोचिकित्सक राजीव मेहता ने अमर उजाला को बताया कि आजकल बहुत सारे बच्चों का पालन-पोषण ऐसे माहौल में हो रहा है, जहां उन्हें ऐसा आभास कराया जा रहा है कि जैसे वे 'राजा' हों, और सब कुछ उनकी इच्छा के अनुसार होगा। हर चीज उनकी इच्छा पर तुरंत उपलब्ध होगी। ऐसा न होने पर कई बार वे अपने सामने मां-बाप को नौकरों को डांटते हुए भी देखते हैं। ऐसे में बच्चों में जिम्मेदारी का भाव पैदा नहीं हो रहा, जिसका परिणाम पुणे जैसे केस के रूप में सामने आ रहा है।
राजीव मेहता ने कहा कि मां-बाप अपने बच्चों को समय नहीं देंगे, उन्हें अपने कर्तव्य और अधिकार के बारे में सही से नहीं बताएंगे, तो स्थिति बिगड़ेगी। हर चीज को उनकी इच्छा पर तुरंत न उपलब्ध कराएं। कुछ चीजें आप उन्हें तुरंत दे सकते हैं, तो कुछ के लिए उन्हें इंतजार करने के लिए कह सकते हैं। इससे उन्हें पता चलेगा कि हर चीज उनकी इच्छा पर तुरंत उपलब्ध नहीं हो सकती। खाने के बाद प्लेटें नौकर न रखें, उन्हें स्वयं अपना कुछ काम करने दें, जिससे उन्हें पता चले कि उनकी जिम्मेदारी के बिना समाज में सब कुछ उन्हें नहीं मिलेगा।
बाल सुधार संस्था प्रयास के पूर्व निदेशक विश्वजीत घोषाल ने अमर उजाला से कहा कि संयुक्त परिवार होने पर बच्चे को परिवार के लोगों से सही-गलत की शिक्षा मिलती थी, लेकिन अब एकाकी परिवार होने और मां-बाप दोनों के नौकरी में व्यस्त होने से बच्चों को इसकी शिक्षा नहीं मिल रही है। उनमें सही-गलत और अपने कर्तव्य का भाव पैदा नहीं हो रहा है। उच्च वर्गीय माता-पिता बार-बार बच्चों को उनके अधिकारों के बारे में बताते हैं, लेकिन उसकी जिम्मेदारियों के बारे में कुछ नहीं बताते। इसका परिणाम यह सामने आ रहा है कि बच्चों को लगता है कि सब कुछ उनके लिए बना है, लेकिन स्वयं उनका इस समाज या देश के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है। इस तरह के अपराधों के पीछे यह एक बड़ा कारण है।
विश्वजीत घोषाल ने कहा कि इस मामले में कानून और न्याय व्यवस्था की खामी तो सामने आई ही है, एक बड़ी खामी यह भी सामने आई है कि बच्चे का पिता ही उसका बचाव करने के लिए लगातार प्रयास करता रहा। जो पिता अपने बच्चे को लाइसेंस लिए बिना दो करोड़ की महंगी गाड़ी देकर बाहर जाने देता है, उसे मनचाहे पैसे शराब पर खर्च करने के लिए क्रेडिट कार्ड दे रहा है, वह उसे अपनी मनमानी करने के लिए प्रेरित कर रहा है। इस मामले में बच्चे से ज्यादा जिम्मेदार तो उसका पिता है।
बच्चों को कब वयस्क माना जाए
दिल्ली की जुवेनाइल कोर्ट में वकालत करने वाली वकील आभा सिन्हा ने कहा कि निर्भया कांड में भी यह बात सामने आई थी कि किसी नाबालिग को किस स्थिति में नाबालिग माना जाए और किस स्थिति में उस पर बालिग के तौर पर केस चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि नाबालिग उम्र के कारण कई बार संगीन अपराध करने वाले लोग भी बच निकलते हैं, लेकिन केवल कुछ मामलों के कारण हर बाल अपराधी को एक समान कैटेगरी में रखकर उसे न्याय के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
लेकिन गंभीर किस्म के अपराधों में अलग-अलग मामलों के अनुसार बच्चों को भी कड़ा दंड देने के उदाहरण पेश करने पड़ेंगे, जिससे इस उम्र के बच्चों में भी कानून के प्रति डर और सम्मान का भाव पैदा होगा। उन्होंने कहा कि अलग-अलग मामलों में विदेशों में 13-14 या 15-16 साल के बच्चों को वयस्क अपराधी की तरह माना जाता है।