कोरोना संक्रमण की दर कम रखने के लिए दुनिया के अनेक देशों ने अपने यहां लॉकडाउन लगाया। इस दौरान व्यापारिक गतिविधियां, कल-कारखाने बंद रहे। इससे करोड़ों लोगों को बेरोजगार होना पड़ा और उनके परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया।
वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में एक करोड़ से अधिक बाल श्रमिक विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे थे। आज भी अकेले बिहार में 10.88 लाख बाल श्रमिक विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।
यह संख्या भारत के कुल बाल श्रमिकों की लगभग 10.7 फीसदी है।
भारत ने वर्ष 2025 तक देश से बाल श्रम मजदूरी को समूल नष्ट करने की प्रतिबद्धता जाहिर कर रखी है।
अनुमान है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे अपेक्षाकृत ज्यादा पिछड़े राज्यों में कोरोना काल में गरीबी बढ़ सकती है।
औद्योगिक गतिविधयों के धीमेपन का असर लोगों की रोजी-रोटी पर पड़ सकता है। इससे इन राज्यों के गरीब लोग अपने बच्चों को बाल मजदूरी के लिए भेजने पर मजबूर हो सकते हैं।
बचपन बचाओ आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता राकेश सेंगर ने अमर उजाला को बताया कि अनुमान है कि कोरोना के बाद के परिणामों में लोग अपने बच्चों को अनैतिक गतिविधियों में धकेलने को भी मजबूर हो सकते हैं।
अगर केंद्र और राज्य सरकारें अपने यहां गरीबी रोकने, परिवारों को खाद्यान्न सुरक्षा देने और बेरोजगार हुए लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने में सफल नहीं हो पाईं, तो बच्चों को इसका सीधा दुष्परिणाम झेलना पड़ सकता है।
बचपन बचाओ आंदोलन की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के हितों के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी मांगी है। केंद्र को जानकारी उपलब्ध कराने के लिए दो हफ्ते का समय दिया गया है।
संगठन ने अपनी याचिका में इस बात की आशंका जाहिर की है कि कोरोना काल के बाद बच्चों को न सिर्फ मजदूरी में धकेला जा सकता है, बल्कि उन्हें वेश्यावृत्ति जैसे घोर अनैतिक पेशे में जाने को भी मजबूर किया जा सकता है।
इस दौरान बाल तस्करी और बाल विवाह की घटनाओं के बढ़ने की भी आशंका व्यक्त की गई है।
एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016 में बाल श्रम विरोधी कानून (CLPRA) के तहत 204 मामले दर्ज किए गये थे। इसी प्रकार 2017 में 462 और 2018 में 464 लोगों पर कार्रवाई हुई थी।
इन मामलों में न्यूनतम 1879 बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्त भी कराया गया था।
शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के दो हजार बच्चों के लिए विशेष छात्रवृत्ति योजना का आरंभ किया। इसके तहत बच्चों को आठवीं, नवीं और दसवीं की परीक्षा पास करने पर एक हजार रुपये मासिक सहायता राशि दी जाएगी।
इसके आलावा कक्षाओं में उत्तीर्ण होने पर उन्हें छह हजार रुपये की अतिरिक्त सहायता दी जाएगी। मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई है कि प्रदेश से जल्दी ही बाल श्रम को मुक्त करा लिया जायेगा।