आप जानते ही हैं कि गुरु-शिष्य के रिश्ते के साथ एक और परंपरा जुड़ी हैं। गुरु-दक्षिणा...आज समय भले ही बदल गया हो, मगर दशकों पहले तक यह परंपरा हमारे देश की शिक्षा प्रणाली का सबसे चमकदार पक्ष रहा है। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके कोंडागांव में तो यह परंपरा आज भी जीवित है। आईटीबीपी ने यहां के बच्चों को गणित और विज्ञान की निशुल्क कोचिंग (यानी निष्ठा एवं सेवाभाव ) से दी। बच्चों के अच्छे नंबर आ गए। बच्चों ने कहा, हम गुरु-दक्षिणा तो अवश्य देंगे। उन्होंने दे भी दी। क्या दिया, आईटीबीपी जवानों को 'हल्बी' स्थानीय भाषा बोलना सिखा दिया। इस भाषा का ज्ञान न होने के कारण जवानों को नक्सलियों से लड़ने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। नक्सलियों के बारे में जब स्थानीय लोगों से इन जवानों को कोई इनपुट मिलता तो वे 'हल्बी' न जानने की वजह से उसे नहीं समझ पाते थे।
नक्सली हिंसा से जूझ रहे अबूझमाड़ से लगे कोंडागांव जिले में डेढ़ वर्ष पहले भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवानों ने स्थानीय स्कूलों में पढ़ाना शुरू किया था। हदेली और कई दूसरे गांवों के पास स्थापित आइटीबीपी कैंप में जवानों को पता चला कि यहां गणित और विज्ञान में बच्चे कमजोर हैं। जवानों ने अपने अधिकारियों को भी यह बात बताई। निर्णय यह लिया गया कि गणित और विज्ञान विषय में जिन जवानों को अच्छी महारत हासिल है, वे इन बच्चों को पढाएंगे। यह बात धीरे-धीरे हदेली ही नहीं, बल्कि आसपास के गावों तक पहुंच गई। बच्चे आईटीबीपी जवानों के पास पढ़ने के लिए आने लगे। जवान जैसे अपनी ड्यूटी से हटते, तुरंत स्कूल पहुंच जाते हैं।
स्कूली बच्चे
समय बीतने लगा और वे बच्चे गुरु-शिष्य के अलावा एक-दूसरे के साथ अच्छे दोस्त भी बन गए। इतना ही नहीं, अगर जवानों को यह पता चलता कि फलां स्कूल में इन विषयों का कोई भी शिक्षक नहीं है तो वे वहां पर जाने लगे। हदेली के विद्यालय में प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में कुल 85 छात्र-छात्राएं पढ़ रहे हैं। चूंकि जवान और बच्चों में दोस्ती हो गई थी तो वे अपने आस-पड़ोस की दिक्कतें भी सांझा करने लगे। बच्चों ने कहा, हमारे घर में पीने का साफ पानी नहीं, कोई बीमार हो जाए तो दवा नहीं मिलती। आईटीबीपी जवानों ने उनकी ये दोनों ही मांगें पूरी कर दी।परीक्षा में बच्चों के अच्छे नंबर आने लगे।उनके अभिभावक भी स्कूल में आकर जवानों का आभार जताते।
..और बच्चों ने गुरु-दक्षिणा में दे दी 'हल्बी', बच्चे शिक्षक बनें तो जवान विद्यार्थी
बच्चों ने आईटीबीपी जवानों से कहा, आपने हमारी बहुत मदद की है। हम आपको गुरु-दक्षिणा देना चाहते हैं।जवानों ने कहा, ठीक है आप कुछ देना ही चाह रहे हैं तो हमें अपनी मातृभाषा सिखा दें। बस फिर क्या था।एक बार दोबारा से स्कूल शुरु। इस बार बच्चे शिक्षक बन गए और आईटीबीपी के जवान विद्यार्थी की भूमिका में आ गए। बच्चों ने कभी इशारों से तो कभी लिखकर उन्हें अपनी भाषा सिखा दी। कई बार तो बच्चों ने जवानों को सिखाने के लिए कलाकृतियों का सहारा भी लिया। अब जवान इतनी भाषा तो सीख ही गए हैं कि वे नक्सलियों बाबत मिलने वाली सूचनाओं को समझ कर समय रहते कार्रवाई कर सकते हैं। इसका उन्हें बड़ा फायदा पहुंचा है।
आईटीबीपी जवान
धुर नक्सल प्रभावित इलाके में डेढ़ साल पहले आइटीबीपी कैंप खोला गया था...
आईटीबीपी के मुताबिक, डेढ़ साल पहले यहां पर कैंप स्थापित किया गया था।स्थानीय बोली 'हल्बी' समझना जवानों के लिए एक बड़ी समस्या थी। खासतौर से वे जवान जो पहली बार ड्यूटी के लिए इस इलाके में आते हैं। सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए जवानों को ग्रामीणों की मदद लेनी पड़ती थी, मगर भाषाई बाधा की वजह से वे आपस में संवाद स्थापित नहीं कर पाते थे। हल्बी सीखने के बाद लोगों के साथ जवानों का संवाद बढ़ गया। वे उनकी दिक्कतों को समझने लगे। नतीजा, नक्सली गतिविधियों में भी कमी आने लगी। आसपास के क्षेत्रों से सैकड़ों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। हल्बी ओड़िया और मराठी के बीच की एक पूर्वी भारतीय आर्य भाषा है। इसे बस्तरी, हल्बा, हलबास, हलवी और महरी के नाम से भी जाना जाता है। कोंडागांव जिले में आईटीबीपी वर्ष 2015 से एन्टी नक्सल आपरेशन में तैनात है।