अंतरिक्ष में इतिहास रचने के भारत एकदम करीब पहुंच गया था लेकिन चंद्रमा के तल से केवल 2.1 किलोमीटर ऊपर चंद्रयान का इसरो से संपर्क टूट गया। पूरी तरह स्वदेशी चंद्रयान-2 का लैंडर (विक्रम) शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात 1:53 बजे चांद पर उतरने वाला था। रात करीब ढाई बजे इसरो अध्यक्ष के सिवन ने बताया कि 'यान का संपर्क टूट गया है।
चंद्रयान-2 मिशन को 2008 में मंजूरी मिली थी। इसके बाद सबसे बड़ी चुनौती लैंडर और रोवर की टेस्टिंग थी। इसके लिए चंद्रमा जैसी मिट्टी, कम ग्रेविटी वाला क्षेत्र, चांद पर पड़ने वाली चमकदार रोशनी और वातावरण वैसा ही रीक्रिएट करने की जरूरत थी। इसका एक तरीका था अमेरिका से सिमुलेटेड लूनर सॉयल (चांद जैसी मिट्टी) लाना। जिसकी प्रति किलो कीमत 10,752 रुपये है। हमें इस तरह की 70 टन मिट्टी की जरूरत थी। इसकी लागत काफी अधिक थी इसलिए तय किया गया कि थोड़ी सी मिट्टी अमेरिका से खरीदी जाए और उसका अध्ययन करके ऐसी ही मिट्टी को ढूंढा जाए।
इसके बाद पता चला कि तमिलनाडु के सालेम में एनॉर्थोसाइट नाम की चट्टानें हैं जो चांद की चट्टानों से मिलते हैं। जिस मिट्टी को खरीदने के लिए हमें 72 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते वह काम मुफ्त में हो गया। त्रिची के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, पेरियार यूनिवर्सिटी और बेंगलुरू के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ने उन चट्टानों को पीसकर चंद्रमा जैसी मिट्टी तैयार की।