अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रयान-3 की तैयारी में '1580' आंखों का बड़ा योगदान हैं। ये वे आंखें हैं, जिन्होंने एक सेकंड भी खुद को चंद्रयान 3 से अलग नहीं किया है। 14 जुलाई से लेकर अब तक इसरो के 790 वैज्ञानिक दिन-रात इस मिशन से जुड़े रहे हैं। वैज्ञानिकों ने 960 घंटे तक चंद्रयान 3 पर नजर रखी है।
स्पेस कमीशन के सदस्य डॉ. किरण कुमार ने अमर उजाला डॉट कॉम से बातचीत करते हुए कहा, 'चंद्रयान-3' को लेकर 'इसरो' बहुत आशान्वित है। इसमें सैंकड़ों वैज्ञानिकों ने दिन रात काम किया है। लैंडिंग के बाद हर पल चंद्रयान 3 पर नजर रखी गई है। कोई वैज्ञानिक अपनी शिफ्ट के बाद जब घर जाता था तो वह सोता नहीं था। उसका मन घर पर नहीं लगता था। उसे नींद नहीं आती थी। वह खुद को अपडेट रखने के लिए कंट्रोल सेंटर में बात करता था। सभी का एक ही जुनून था कि चंद्रयान 3, सुरक्षित तरीके से चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करे। चंद्रयान को कहां पर उतारना है, ये सब बातें पहले ही तय कर ली गई।
इसरो में वैज्ञानिकों की कई टीमें अलग अलग कामों पर लगी थी। कोई चंद्रयान की दिशा देख रहा था तो कोई स्पीड। किसी को तकनीकी खराबी जांच का काम मिला तो कोई वैज्ञानिक चंद्रयान को उतारने का प्लेटफॉर्म तैयार कर रहा था। मैनेज मिशन के तहत यह सब 'मिनट टू मिनट' आधार पर चलता रहा। रॉकेट छोड़ने के बाद तो कई टीमों ने लैंडर से नजर नहीं हटाई। इसरो के कंट्रोल सेंटर में लगभग दो सौ वैज्ञानिकों की टीम पल पल नजर रख रही थी। अगर चंद्रयान 3 की प्लानिंग की बात करें तो उसमें 790 से अधिक वैज्ञानिक शामिल रहे हैं।
'इसरो' ने चंद्रयान 3 की सॉफ्ट लैंडिंग के लिए प्लान 'बी' तैयार किया है। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि लैंडिंग के वक्त कोई बाधा आए तो उसके उतारने का समय आगे बढ़ाया जा सकता है। हालांकि ये प्लान तभी अमल में लाया जाएगा, जब चंद्रमा पर विशालकाय आकार का कोई गड्ढा यानी क्रेटर सामने होगा। हालांकि इसरो ने चट्टान और विशाल गड्ढे से भी निपटने का इंतजाम किया है। अंतिम क्षण में सॉफ्ट लैंडिंग की प्रक्रिया को तीन चार दिन तक बढ़ाया जा सकता है। अगर क्रेटर ज्यादा बड़ा और गहरा नहीं है तो चिंता की कोई बात नहीं होगी। लैंडर और रोवर के सोलर पैनल को पर्याप्त धूप यानी एनर्जी मिलेगी।