विक्रम के उतरने के बाद भी उसके भीतर रखे गए रोवर प्रज्ञान को अगले चार घंटे तक बाहर नहीं निकालने की योजना बनाई गई है। इसकी वजह लैंडिंग की वजह से उड़ी धूल है। चंद्रमा के कमजोर गुरुत्वाकरर्षण में यह धूल न केवल काफी समय बनी रह सकती है, बल्कि उपकरणों को नुकसान भी पहुंचा सकती है। प्रज्ञान जिसे 14 दिन काम करना है और चंद्र सतह पर 500 मीटर चलना है, उसके लिए मिशन को जोखिम में डालने वाली स्थितियां होंगी।
ऑर्बिटर : यह अपना काम पहले ही शुरू कर चुका है। उसने पहले पृथ्वी और फिर चंद्रमा की कई तस्वीरें इसरो को भेजी हैं। 2379 किलो का यह उपकरण आठ किस्म के उपकरणों से लैस है। वे सभी चंद्रमा की मैपिंग से लेकर स्कैनिंग और भौगोलिक संरचना का विश्लेषण करने में जुटेंगे।
विक्रम और प्रज्ञान : विक्रम लैंडर का सबसे महत्वपूर्ण काम प्रज्ञान केसाथ चंद्रमा की सतह पर उतरना है। ये दोनों मिलकर 14 दिन (चंद्रमा का एक दिन) काम करेंगे। लैंडिंग के चार घंटे बाद सात सितंबर को ही सुबह करीब 5:45 बजे प्रज्ञान रोवर विक्रम से बाहर आकर अपने प्रयोग करेगा। चंद्रमा का दक्षिण ध्रुव होने की वजह से यहां सूर्य की रोशनी लंबे समय तक मिलेगी। वे इसका उपयोग अपनी बैटरियां चार्ज करने में करेंगे।
विशेष : आगे भी काम करते रह सकते हैं
सौर ऊर्जा से बैटरियाें को चार्जिंग मिलने की वजह से कुछ वैज्ञानिकाें का अनुमान है कि विक्रम और प्रज्ञान आगे भी काम करते रह सकते हैं। हालांकि यह सौर गतिविधियों के लैंडिंग स्थल पर असर, तापमान के उतार-चढ़ाव और सूर्य के प्रकाश की उपलब्धता पर निर्भर करेगा। 14 दिन के बाद रात होगी, जिसके विकट हालात अगर उन्हें बहुत नुकसान नहीं पहुंचाते हैं तो बहुत संभव है कि कुछ समय बाद इसरो हमें सूचना दे कि ये दोनों विभिन्न प्रयोगों को अंजाम दे रहे हैं।