चंद्रयान-2 दुनिया का पहला ऐसा मिशन बन जाएगा जो चांद की दक्षिणी सतह पर उतरेगा। यह वह अंधेरा हिस्सा है जहां उतरने का किसी देश ने साहस नहीं किया है। इससे पहले 2008 में चंद्रयान-1 और 2013 में मार्स ऑर्बिटर मिशन को अंजाम दिया गया था। यह भारत का तीसरा मिशन है। जियोसिंक्रोनस लॉन्च व्हीकल मार्क 3 भारत में अब तक बना सबसे शक्तिशाली रॉकेट है। यह चंद्रयान-2 को चंद्रमा की कक्षा तक ले जाएगा।
मिशन से पहले इसरो अध्यक्ष भी थे उत्साहित
मिशन से पहले इसरो के अध्यक्ष के सिवन ने कहा था कि हमारे काम का सबसे बड़ा उद्देश्य देश, समाज और वैज्ञानिक समुदाय के लिए लाभकारी चीजें तैयार करना है। हम पुरानी हासिल ख्यातियों के भरोसे नहीं रहना चाहते, हम लगातार भविष्य की ओर देखना चाहते हैं और उन चुनौतियों की पहचान करना चाहते हैं जो हमारे काम में आड़े आ सकती हैं। इस प्रकार के मिशन के बारे में सोचने और उसे अमली जामा पहनाने में काफी मेहनत और समन्वय की जरूरत होती है।
वहीं, इसरो के पूर्व अध्यक्ष के राधाकृष्णन ने कहा था कि चंद्रयान-2 भारत का चंद्रमा पर पहला रोबोटिक मिशन है। छह हजार किमी प्रति घंटे की गति से चंद्रमा की परिक्रमा करते लैंडर विक्रम को अपने वेग पर नियंत्रण पाकर चंद्रमा की अनिश्चिता भरी सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करनी होगी। 16 मिनट में यह सब होगा। इसी वजह से यह बेहद जटिल और दुष्कर भी है। देश इस मिशन को देख रहा है। दूसरी ओर भारत मानव को अंतरिक्ष में भेजने और ग्रहों के अन्वेषण के मुहाने पर खड़ा है, यह हमारी नई पीढ़ी और भविष्य के लिए चुनौतियों भरा है, लेकिन भारी संभावनाओं को खोलेगा।