करो या मरो
चंद्रबाबू नायडू के लिए 11 अप्रैल को होने वाला विधानसभा चुनाव करो या मरो का सवाल है। वह पूरी तरह अकेले पड़ चुके हैं। उनके खिलाफ भाजपा है, वाईएसआर कांग्रेस है, पवन कल्याण की जनसेना है और कांग्रेस भी। 72 साल के नायडू संभवत: अगला चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं होंगे। लोगों को उनके बेटे नारा लोकेश में विरासत संभालने की काबिलियत नहीं दिखती। हर जनसभा में नायडू आरोप लगाते हैं कि जगन मोहन को पर्दे के पीछे से भाजपा व पवन कल्याण का समर्थन तो है ही, उन्हें तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव भी सपोर्ट कर रहे हैं। आंध्र में कांग्रेस की उपस्थिति ना के बराबर है, इसलिए उसका समर्थन या विरोध बेमानी है।
पवन कल्याण की पार्टी अधिकतर उत्तरी आंध्र में मजबूत है, जबकि जगनमोहन की पार्टी दक्षिण में। इसलिए यह दोनों एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं। वहीं तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने हाल ही में एक बयान में कहा कि चुनाव के बाद उनकी और जगन मोहन की भूमिका राष्ट्रीय राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण होने वाली है। राजनीतिक विश्लेषक इस बयान का निहितार्थ निकाल रहे हैं कि वे दोनों भाजपा का दामन थाम सकते हैं।
जगन मोहन के लिए भी यह चुनाव जीवन-मरण का सवाल ही है। 2010 में पिता राजशेखर रेड्डी की मृत्यु के बाद वे कांग्रेस से बाहर हो गए। संघर्ष करते नौ वर्ष हो चुके हैं। यदि उन्हें 5 और वर्षों की प्रतीक्षा करनी पड़ी तो उन्हें स्वयं नहीं पता उनका कितना काडर पार्टी के साथ रहेगा। राजनीतिक विश्लेषक कारी श्रीराम कहते हैं, यही हालत नायडू की टीडीपी की भी हो सकती है। यदि वह यह चुनाव हार गए तो उनकी पार्टी में भगदड़ मच सकती है।