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यहां तक फैली हैं हिमालय की 'जड़ें', भूकंप के लिहाज से अति संवेदनशील है उत्तर भारत

Tue, 16 Feb 2021 03:32 PM IST
Harendra Chaudhary आशीष तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

भूकंप पर नजर रखने के लिए वैज्ञानिकों की संस्था जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और मौसम विज्ञान के विशेषज्ञों ने अपने आकलन में पाया है कि बीते कुछ सालों में भूकंप की घटनाएं रोजाना औसतन 3 से ज्यादा हो रही हैं...
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chamoli disaster - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमालय पर्वत की चट्टानों की जड़ें देश की राजधानी दिल्ली तक फैली हुई हैं। न सिर्फ देश की राजधानी बल्कि पंजाब और राजस्थान में भी इनकी पहुंच है। भू-वैज्ञानिकों का दावा है कि जब कभी ज्यादा रिक्टर स्केल का भूकंप आएगा, तो यह राज्य हमेशा से संवेदनशील हो जाएंगे। नेपाल में आए भूकंप के बाद वैज्ञानिकों की अपनी रिसर्च में ऐसे कई तथ्य सामने आए जो इस बात के लिए आगाह करते हैं कि आने वाले दिनों में भूकंप से बड़ी तबाही भी हो सकती है।

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जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक एसएन चंदेल कहते हैं कि हिमालय का विस्तार जितना ऊपर है उतना ही नीचे भी है। उन्होंने बताया कि नेपाल में भूकंप आने के बाद उनके शोध यह साबित करते हैं कि हिमालय की निचले हिस्से में आई चट्टानों की दरारें ज्यादा खतरनाक हो चुकी हैं। डॉक्टर चंदेल कहते हैं हिमालय की कई चट्टानों की श्रृंखलाएं जो निचले हिस्से में हैं उनकी जड़ें देश की राजधानी दिल्ली समेत पंजाब और राजस्थान के राज्यों में फैली हुई हैं। यही वजह है कि यह राज्य सिस्मिक जोन में अति संवेदनशील माने जाते हैं।

डॉक्टर चंदेल कहते हैं कि नेपाल में आए भूकंप के बाद धरती के नीचे स्थित चट्टानों समेत अन्य दशाएं बदल गई हैं। उनका कहना है बदली हुई दशाएं तुरंत किसी भी तरह से प्रतिक्रिया नहीं करती हैं, लेकिन लंबे अंतराल के बाद उसका असर दिखना शुरू हो जाता है। डॉक्टर चंदेल का अनुमान है कि जिस तरीके से बीते कुछ समय में लगातार भूकंप की घटनाएं सामने आ रही हैं वह इस बात की गवाही देती हैं कि धरती के नीचे हलचल मची हुई है।
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भूकंप पर नजर रखने के लिए वैज्ञानिकों की संस्था जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और मौसम विज्ञान के विशेषज्ञों ने अपने आकलन में पाया है कि बीते कुछ सालों में भूकंप की घटनाएं रोजाना औसतन 3 से ज्यादा हो रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है यह घटनाएं नेपाल के भूकंप आने के बाद कुछ ज्यादा ही बढ़ी हैं। भू वैज्ञानिकों का कहना है कि कच्छ में आए भूकंप और लातूर में आए भूकंप के बाद भी इस प्रकार का ट्रेंड देखने को मिला था। दोनों जगह आए भूकंप के बाद धरती के अंदर चट्टानों के टकराने से लगातार ऊर्जा बनती रही और भूकंप की संख्या लगातार बढ़ती रही।

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