साल के आखिर में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में होनेवाले विधानसभा चुनावों और अगले साल 2019 के आम चुनाव के मद्देनजर भाजपा चुनावी मैदान में डट गई है। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक नई दिल्ली में रविवार को संपन्न हो गई। इस बैठक में भाजपा की चुनावी तैयारियों पर मंथन हुआ। चुनावी साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के सामने खड़़ी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई।
चुनावी साल में प्रधानमंत्री की चुनौतियां
1. पेट्रोल-डीजल के आसमान छूते दाम
नोटबंदी और फिर जीएसटी लागू होने के बाद पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ती कीमतें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए चिंता का सबब बने हुए हैं। विपक्षी पार्टियां पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों को लेकर सरकार पर लगातार निशाना साध रही हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में हुई लगातार वृद्धि के खिलाफ कांग्रेस ने 10 सितंबर को 'भारत बंद' बुलाया जिसे विभिन्न 21 राजनीतिक दलों ने अपना समर्थन दिया है। हालांकि शिवसेना भारत बंद में ऐन मौके पर शामिल नहीं हुई लेकिन पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर भाजपा पर निशाना साध रही है। शिवसेना ने मुंबई में पोस्टर लगाकर 2015 से लेकर 2018 के बीच पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम में हुए इजाफे को दिखाया है।
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2. किसानों की नाराजगी
केंद्र सरकार ने फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने का एलान किया है। बड़ा सवाल यही है कि क्या किसानों को उचित एमएसपी पर मिल पाता है। कृषि क्षेत्र के जानकार इस योजना के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करते हैं। वामपंथी संगठनों की अगुवाई में दिल्ली में एक बड़ी रैली का आयोजन किया था जिसमें देशभर के लाखों किसान और मजदूर इकट्ठा हुए थे। चुनावी साल में सरकार को किसानों से जुड़ी योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर ध्यान देना होगा ताकि उनसे जुड़ी योजनाओं के बारे में किसानों को सही जानकारी मिल सके।
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3. भीड़ हिंसा
देश में अचानक से भीड़ हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई। भीड़ द्वारा लोगों को पीट-पीट कर हत्या कर देने की वारदातों ने कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। महज अफवाहों से लोग हिंसक हो उठते हैं और भीड़ की शक्ल ले लेते हैं। कथित गो तस्करों, बच्चा चोरों, लव जिहाद जैसी अफवाहों के बाद भीड़ हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं। भीड़ हिंसा की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्य सरकार को दिशानिर्देशों के प्रचार के निर्देश दिए। केंद्र सरकार ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप को चेतावनी दी थी कि वह अफवाह, भड़काऊ और फेक न्यूज पर रोक लगाने के लिए कदम उठाए। लेकिन इसके बाद भी हिंसक भीड़ द्वारा किसी की जान लेने की घटनाओं पर रोक नहीं लगी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार के लिए मॉब लिंचिंग एक बड़ी चिंता की बात बनती जा रही है।
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- फोटो : amar ujala
4. अनुसूचित जाति/जनजाति एक्ट
केंद्र सरकार द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम में संशोधन के बाद सवर्ण समाज केंद्र सरकार से नाराज है। इस एक्ट के खिलाफ सवर्ण संगठनों ने छह सितंबर को देशव्यापी बंद का आयोजन किया था। बंद का मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार समेत कई राज्यों में व्यापक असर देखने को मिला। इनमें से कई राज्यों में भाजपा की सरकार है। नीति निर्धारण को प्रभावित करने में सक्षण सवर्णों को चुनावी साल में नाराज करने का जोखिम उठा सरकार के लिए महंगा साबित हो सकता है। करणी सेना ने तो यहां तक एलान कर दिया है कि वह भाजपा के दोहरे रवैए को देखते हुए उसका घेराव करेगी।
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- फोटो : amar ujala
5. सोशल मीडिया
साल 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया ने भाजपा और नरेंद्र मोदी के चुनावी सफर को जितना आसान बना दिया था, आज वही प्रधानमंत्री की चिंता का बड़ा कारण बना हुआ है। भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी का सोशल मीडिया पर पुरजोर विरोध चल रहा है। यहां तक की उनके खिलाफ कई आंदोलनों की रूपरेखा भी इसी सोशल मीडिया पर तैयार हुई है। किसान आंदोलन से लेकर आरक्षण और एससी एसटी एक्ट के खिलाफ हुए आंदोलनों में सोशल मीडिया बड़ा प्लेटफॉर्म बना।
साल 2014 से पहले नरेंद्र मोदी अपने चुनावी भाषणों में रुपये के गिरते मूल्य का बार-बार जिक्र किया करते थे। लेकिन अब रुपये का गिरता मूल्य उनकी चिंता का सबब बना हुआ है। डॉलर के मुकाबले रुपए में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। 10 सितंबर को रुपये में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली। डॉलर के मुकाबले रुपया 45 पैसे की गिरावट के साथ 72.18 पर खुला। वहीं शेयर बाजार में भी गिरावट का दौर जारी रहा और सेंसेक्स 100 अंक लुढ़क कर कारोबार करते हुए देखा गया। यह रुपए की ऐतिहासिक गिरावट है। गिरते रुपए का असर सीधे कच्चे तेल के आयात पर पड़ता है, इससे पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि होती है और महंगाई बढ़ती है। आने वाले चुनावों को देखते हुए गिरता रुपया मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।