लेकिन चार राज्यों में भाजपा को मिली बंपर जीत का सीधा असर राजे की इस रणनीति पर दिखाई दे सकता है। अब उनके सीएम फेस बनाए जाने की मांग पहले की तुलना में कमजोर पड़ेगी। क्योंकि प्रदेश भाजपा दूसरा गुट चार राज्यों की जीत पीएम मोदी के नाम और काम की जीत बताने में लगा हुआ है। विरोधी नेताओं का कहना है कि यह जीत केवल पीएम मोदी के काम के आधार पर हुई हैं। चारों राज्यों में प्रचार के दौरान मुख्य केंद्र बिंदु पीएम ही थे।
भाजपा का राष्ट्रवाद का गणित
राज्य के राजनीतिक जानकार कहते है कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने राजे के विकल्प के रूप में करीब आधा दर्जन नेताओं की फौज खड़ी कर दी। इसमें केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला और सांसद दीया कुमारी जैसे चेहरे प्रमुख हैं। लेकिन भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और वसुंधरा राजे दोनों ही अब अगली रणनीति के लिए पांच राज्यों के चुनाव नतीजों का इंतजार कर रहे थे। इन चुनाव से ये देखना था कि भाजपा की राष्ट्रवाद की लहर अभी भी मजबूत है या कमजोर पड़ चुकी है। क्योंकि भाजपा का सीधा गणित है, अगर राष्ट्रवाद की लहर चुनाव में काम कर रही हो तो फिर सीएम फेस की खास जरूरत नहीं है। पार्टी बिना चेहरे के भी चुनाव जीत सकती है।
ऐसे में राजस्थान में सामूहिक नेतृत्व की अपनी अब तक की रणनीति पर आगे बढ़ा जा सकता है। यूपी, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भाजपा पहले से सत्ता में थी, लिहाजा मुख्यमंत्रियों के चेहरे चुनाव में थे। लेकिन सीएम से अधिक सभी राज्यों में पीएम मोदी का फेस और राष्ट्रवाद की लहर ने इस बार भी अधिक काम किया। सिर्फ यूपी का अपवाद छोड़ दे, तो यूपी में पीएम मोदी के साथ सीएम योगी भी लोकप्रिय चेहरा थे। उत्तराखंड में तो तीन बार सीएम बदलने के बावजूद भाजपा ने बंपर जीत दर्ज की, जिसे पीएम मोदी की लोकप्रियता का ही चमत्कार माना जा रहा है।