केंद्र सरकार ने गुरुवार को दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के प्रावधानों में किसी व्यक्ति के भूल जाने के अधिकार के आधार पर उसके खिलाफ पारित अदालती आदेशों को हटाने की व्यवस्था नहीं है। केंद्र ने कहा, जबकि निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और इसमें भूलने का अधिकार शामिल है, अदालत के आदेशों को हटाने के लिए किसी भी निर्देश को उच्च न्यायालय की ओर से सीधे मध्यस्थ और उस मंच पर पारित किया जाना चाहिए जिस पर उन्हें अपलोड किया जाता है।
यह बात केंद्र सरकार ने दो कारोबारियों की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल की गई एक याचिका को लेकर दाखिल किए गए अपने हलफनामे में कही। इस याचिका में दोनों कारोबारियों ने अपने खिलाफ एक आपराधिक मामले के संबंध में विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफार्म्स से कुछ सामग्री को हटाने की मांग उठाई है। केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम सार्वजनिक पहुंच के लिए सूचना को अवरुद्ध करने का काम करता है लेकिन वर्तमान मामले में इसके प्रावधान लागू नहीं होते हैं।
याचिकाकर्ताओं ने कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से अदालती आदेशों को इस आधार पर हटाने की मांग की थी कि साल 2016 में एक आपराधिक मामले में आरोप मुक्त होने के बावजूद इंटरनेट पर जानकारी उपलब्ध थी जिसके कारण उनको सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ा है। वहीं, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से दाखिल किए गए इस हलफनामे में बताया गया है कि इस अधिनियम की धारा 69 ए मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित मामलों पर ही लागू होती है।