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केंद्र सरकार ने कहा- पत्थरबाजों के खिलाफ केस वापस लेने से गिरेगा सुरक्षाबलों का मनोबल

Wed, 06 Jun 2018 09:23 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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पत्थरबाजी
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जम्मू-कश्मीर में आए-दिन सेना के जवानों और वाहनों पर लोग पत्थर फेंकते रहते हैं। कुछ पत्थरबाजों के खिलाफ केस दर्ज हैं। इसी मामले पर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से कहा है कि पत्थरबाजों के खिलाफ दर्ज केस वापस लेने से सुरक्षाबलों का मनोबल गिरेगा। केंद्र ने यह भी कहा कि ऐसा करने से घाटी में आतंकियों को आंतकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए स्थानीय नागरिकों को मानव ढाल के तौर पर इस्तेमाल करने में बल मिलेगा।

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जवानों के तीन बच्चों द्वारा दायर की गई याचिका पर केंद्र सरकार ने मानवाधिकार आयोग को जवाब दिया है। केंद्र का कहना है कि राज्य सरकार द्वारा पत्थरबाजों के खिलाफ दायर केस को वापस लेने से घाटी में तैनात सुरक्षाबलों का मनोबल गिरेगा और इससे आतंकियों को नागरिकों का इस्तेमाल मानव ढाल के तौर पर करने और आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने का बढ़ावा मिलेगा। केंद्र ने कहा, 'राज्य सरकार का यह दायित्व है कि वह जम्मू और कश्मीर में तैनात सेना के जवानों के मानवाधिकारों को बचाने के लिए पत्थरबाजों और उकसाने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें।'

दो सेवारत और एक सेवानिवृत्त जवानों के बच्चों प्रीति, काजल और प्रभव द्वारा दायर याचिका में पूछा गया है कि जिन सुरक्षाबल के मानवाधिकार का हनन हो रहा है क्या उन्हें मानवाधिकारों की रक्षा करनेवालों की जरुरत नहीं है? इसके साथ ही उस याचिका में बच्चों ने इस बात का भी जिक्र किया है कि भारत के नागरिक, युवा और खासकर एक सेना के जवान के बच्चे होने के नाते वह उन जवानों को लेकर चिंतित हैं जिनकी तैनाती ऐसे अशांत क्षेत्रों में की गई है। 
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जवानों के बच्चों ने जम्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सरकार के फरवरी में लिए फैसले पर सवाल उठाए हैं। पीडीपी सरकार ने 10,000 लोगों के खिलाफ दर्ज पत्थरबाजी मामलों को वापस लेने के आदेश दिए थे। रक्षा मंत्रालय द्वारा रिपोर्ट फाइल करने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2 जून को इस मामले पर मुख्य सचिव का जवाब 6 हफ्तों के अंदर मांगा था। याचिका के अनुसार जम्मू-कश्मीर में तब सेना की तैनाती की गई जब राज्य सरकार वहां की कानून-व्यवस्था को संभालने में असमर्थ हो गई। हालांकि वहां का प्रशासन जिससे सेना को मदद की उम्मीद रहती है वह उनके मानवाधिकारों की रक्षा करने में असफल रही है।

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