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फैसला: फ्रंटलाइन कोरोना वर्कर्स नहीं जज और वकील, सरकार ने विशेष मानने से किया इनकार

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न्यायालयीन सेवा के लिए कोरोना वैक्सीन - फोटो : iStock
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केंद्र सरकार ने कोरोना टीकाकरण के लिए 45 साल से कम उम्र के जज, वकीलों तथा न्यायिक कर्मियों के लिए अलग श्रेणी बनाने से इनकार कर दिया। सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि प्राथमिकता के आधार पर कोविड-19 रोधी टीका लगाने के लिए इनकी विशेष श्रेणी बनाने की जरूरत नहीं है।

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बता दें कि एक जनहित याचिका में कोविड-19 टीकाकरण के लिए न्यायाधीशों, वकीलों और न्यायिक कर्मियों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमण्यिन की पीठ ने कहा कि वह इस याचिका और इससे संबंधित विभिन्न मामलों के यहां स्थानांतरण संबंधी याचिका पर 18 मार्च को सुनवाई करेगी। याचिका में आग्रह किया गया है कि कोविड-19 टीकाकरण के लिए न्यायाधीशों, वकीलों और न्यायिक कर्मियों को प्राथमिकता श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए।

सरकार व सीरम, भारत बॉयोटेक ने दाखिल किया जवाब
केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि सरकार की ओर से जवाब दाखिल किया जा चुका है। सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और भारत बायोटेक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि विभिन्न हाईकोर्ट इस बारे में विवरण मांग रहे हैं कि कितने टीकों का उत्पादन किया जा रहा है? सभी लोगों को टीका कब लगाया जाएगा? रोहतगी ने कहा कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है और उन्होंने हाईकोर्टों के समक्ष दायर सभी मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने का आग्रह करते हुए याचिका दायर की।
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अलग श्रेणी बनाना भेदभाव होगा
केंद्र ने अपने शपथपत्र में कहा कि 45 साल से कम उम्र के वकीलों तथा अन्य के लिए अलग श्रेणी बनाना वांछनीय नहीं है और इस तरह का वर्गीकरण दूसरे कार्यों तथा व्यवसाय से जुड़े लोगों एवं समान भौगोलिक स्थितियों और परिस्थितियों में काम करनेवाले लोगों के साथ भेदभाव होगा। पहले से ही श्रमशक्ति और अवसंरचना क्षमता से परे जाकर तैयार किए जा रहे टीके का वैश्विक महामारी के मद्देनजर निर्यात भी किया जा रहा है।

टीकाकरण न्यायिक समीक्षा का विषय नहीं
केंद्र ने कहा कि टीकाकरण संबंधी निर्णय पूरी तरह कार्यपालिका का निर्णय है जो देश के व्यापक हित को देखते हुए लिया गया है तथा यह न्यायिक समीक्षा का विषय नहीं है।

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