केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में राज्यपाल से संबंधित एक मामले में सुनवाई के दौरान अपनी दलील पेश की। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह यह नहीं कह रही कि राज्यपाल विधानसभा से पास हुए बिलों को अनिश्चितकाल तक लटकाते रहें, लेकिन ज्यादातर मामलों में राज्यपालों ने वैसा ही काम किया है जैसा सुप्रीम कोर्ट उनसे उम्मीद करता। बता दें कि मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ यह तय कर रही है कि क्या राष्ट्रपति और राज्यपाल को बिलों पर फैसला लेने के लिए समय-सीमा तय की जा सकती है।
इस दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्यपाल कोई रबर स्टांप (मुहर लगाकर पास करने वाला अधिकारी) नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अगर राज्यपाल को बिल को मंज़ूरी न देने या रोके रखने का कोई अधिकार न दिया जाए, तो वह संविधान की रक्षा करने की शपथ का पालन नहीं कर पाएंगे।
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क्या बोले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आगे कहा कि अगर कुछ राज्यों की दलील मान ली जाए जैसे कि तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, पंजाब आदि तो इससे राज्यपाल का पद मूक दर्शक बन जाएगा और उनकी भूमिका सिर्फ नाम की रह जाएगी। मेहता ने यह भी कहा कि अगर कोई बिल पूरी तरह से असंवैधानिक हो, तब भी राज्यपाल उसे रोके नहीं, तो यह संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ होगा। उन्होंने साफ किया कि हर मामले में एक जैसा नियम नहीं लागू किया जा सकता और संविधान का ढांचा ही ऐसा है कि केंद्र और राज्य मिलकर काम करें।
इसके साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि पिछले 75 वर्षों से मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच मिल-बैठकर ही बिलों पर सहमति बनी है और ज्यादातर मामलों में यह सुप्रीम कोर्ट तक नहीं आया। आजकल राज्यों की तरफ से सीधे सुप्रीम कोर्ट आना एक नई प्रवृत्ति बन गई है। मेहता ने कहा कि राज्यपाल न तो सुपर चीफ मिनिस्टर हैं, न ही पूरी तरह राजनीति से हटे हुए। लेकिन उनकी भूमिका बहुत अहम है, संवैधानिक संतुलन बनाए रखने में।
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राष्ट्रपति की तुलना का भी किया विरोध
इसके साथ ही मेहता ने पंजाब की तरफ से पेश हुए वकील अरविंद दातार के उस तर्क का भी विरोध किया जिसमें उन्होंने भारत के राष्ट्रपति की तुलना ब्रिटेन के राजा या रानी से की थी। इसपर मेहता ने कहा कि भारत का राष्ट्रपति चुना हुआ होता है, जबकि ब्रिटेन का राजा वंशानुगत होता है, इसलिए दोनों की तुलना नहीं की जा सकती।
अंत में, उन्होंने कहा कि कोर्ट को संविधान की व्याख्या इस तरह नहीं करनी चाहिए जिससे वो संविधान में बदलाव जैसा लगे। गौरतलब है कि मई 2024 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी कि क्या न्यायपालिका, राष्ट्रपति या राज्यपाल को बिलों पर समयसीमा के अंदर निर्णय लेने का आदेश दे सकती है या नहीं।