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CGHS: क्या नौकरशाही की भूलभुलैया बन गई है केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा 'सीजीएचएस', जेसीएम सदस्य ने क्यों कही ये बात

सार

एआईडीईएफ के महासचिव सी.श्रीकुमार ने केंद्रीय सरकार की स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) को नौकरशाही की भूलभुलैया करार दिया है। श्रीकुमार ने कहा, 'सीजीएचएस' धीरे-धीरे दुःस्वप्न में तब्दील हो रही है। पेंशनभोगियों को बुनियादी चिकित्सा देखभाल के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है।
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सीजीएचएस - फोटो : एक्स
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विस्तार
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स्टाफ साइड की राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) के सदस्य और अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (एआईडीईएफ) के महासचिव सी.श्रीकुमार ने केंद्रीय सरकार की स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) को नौकरशाही की भूलभुलैया करार दिया है। श्रीकुमार के मुताबिक, जिस योजना को मूल रूप से केंद्र सरकार के कर्मचारियों, पेंशनभोगियों, सांसदों और न्यायाधीशों के लिए जीवन रेखा के रूप में देखा गया था, अब इसे कठिनाई का एक बड़ा स्रोत माना जा रहा है। खासकर बुजुर्ग पेंशनभोगियों के लिए। कभी सुलभ, कैशलेस स्वास्थ्य सेवा का वादा करने वाली सीजीएचएस अब नौकरशाही की भूलभुलैया बन गई है, जो देरी, उपचार से इनकार और बढ़ती निराशाओं से भरी हुई है।

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श्रीकुमार ने कहा, 'सीजीएचएस' धीरे-धीरे दुःस्वप्न में तब्दील हो रही है। पेंशनभोगियों को बुनियादी चिकित्सा देखभाल के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है, जबकि उन्होंने अपनी सेवा के दौरान इस योजना में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अधिकांश पेंशनभोगी, करीब अस्सी प्रतिशत, गैर-सीजीएचएस क्षेत्रों में रहते हैं। मान्यता प्राप्त सीजीएचएस शहरों के बाहर के क्षेत्रों में रहने वाले सेवानिवृत्त कर्मचारियों को केवल 1,000 रुपये प्रति माह का मामूली निश्चित चिकित्सा भत्ता (एफएमए) मिलता है। सीजीएचएस वेलनेस सेंटर या सूचीबद्ध अस्पतालों तक पहुंच न होने के कारण, कई बुजुर्ग पेंशनभोगियों को खुद की देखभाल करनी पड़ती है। 

श्रीकुमार ने कहा, कई सेवानिवृत्त लोग, सेवानिवृत्ति के बाद अपने गृह नगर लौट जाते हैं। इन टियर-2 और टियर-3 शहरों में सीजीएचएस केंद्रों की कमी है। ऐसे में ये पेंशनभोगी चिकित्सा सहायता से पूरी तरह से कटे हुए हैं। यहां तक कि उन शहरों में भी जहां सीजीएचएस केंद्र हैं, वहां गंभीर स्थिति है। कथित तौर पर प्रत्येक डॉक्टर प्रतिदिन 150-200 रोगियों को संभाल रहा है।  इसके कारण परामर्श में जल्दबाजी, निदान संबंधी त्रुटियां और अत्यधिक रेफरल हो रहे हैं। सीजीएचएस केंद्रों पर डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और यहां तक कि लिपिक कर्मचारियों की भी भारी कमी है। छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज कराने के लिए मरीजों को सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में भेजा जा रहा है। ये सब लाभ के सिस्टम के लिए होता है। 
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बतौर श्रीकुमार, एक प्रमुख चिंता यह है कि कई सीजीएचएस-सूचीबद्ध निजी अस्पताल, उपचार देने से इनकार कर रहे हैं। इन अस्पतालों का दावा है कि सीजीएचएस के उपचार की दरें अव्यवहारिक हैं। सरकारी प्रतिपूर्ति में महीनों लग जाते हैं। अस्पताल अक्सर भावनात्मक रूप से परिवारों पर 'बेहतर' प्रक्रियाओं या ब्रांडेड दवाओं के लिए जेब से पैसे चुकाने का दबाव डालते हैं। ऐसी लागतें, जिनकी भरपाई सीजीएचएस नहीं करता, इससे पेंशनभोगियों के पास अपनी सीमित पेंशन या बचत में से पैसे निकालने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। 

हाल ही में सीजीएचएस सॉफ्टवेयर को एनआईसी से सीडीएसी में स्थानांतरित करने से, खासकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए, भ्रम की एक नई परत जुड़ गई है। कथित तौर पर यह प्रणाली उपयोगकर्ता के अनुकूल नहीं है। कई मामलों में, विशेषज्ञों द्वारा निर्धारित ब्रांडेड दवाओं को रोगी को सूचित किए बिना या डॉक्टर से परामर्श किए बिना स्वतः प्रतिस्थापित किया जा रहा है। श्रीकुमार ने चेतावनी दी है कि यह न केवल अक्षम है, खतरनाक भी है। यह बुजुर्ग रोगियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से समझौता करता है। 

संसदीय स्थायी समिति ने सभी जिला मुख्यालयों में सीजीएचएस वेलनेस सेंटर स्थापित करने, निजी अस्पतालों के लिए उपचार दरों में संशोधन करना, सीजीएचएस के लिए ईसीएचएस अस्पतालों को मान्यता देना और पर्याप्त स्टाफिंग सुनिश्चित करना, आदि सिफारिशें की थी। श्रीकुमार ने बताया, हालांकि इनमें से किसी भी सिफारिश को लागू नहीं किया गया है। उन्होंने सरकार को सीजीएचएस में सुधार के लिए कई सुझाव दिए हैं। इनमें सौ प्रतिशत कैशलेस उपचार, ब्रांडेड दवाओं की उपलब्धता, वरिष्ठों के अनुकूल सॉफ्टवेयर सिस्टम, सभी जिलों में सीजीएचएस का विस्तार और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों की सख्त निगरानी, आदि शामिल हैं। राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) के कर्मचारी पक्ष, इस बाबत अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। सरकार को राष्ट्र की सेवा करने वालों की गरिमा और स्वास्थ्य अधिकारों की रक्षा के लिए अब ठोस कदम उठाना चाहिए। 

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