किसानों का प्रदर्शन(फाइल फोटो)
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किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ होने जा रही बातचीत में केंद्र सरकार झुकने जैसा कोई कदम नहीं उठाएगी। सरकार की तरफ से इस बैठक को लेकर जो संकेत दिए जा रहे हैं, उसमें कानून वापसी जैसा कुछ भी नहीं होगा। यह तय है कि केंद्र सरकार खुले दिल से किसानों के साथ बातचीत करेगी। बताया गया है कि बैठक में केवल पंजाब के किसानों की मांगों पर बातचीत होगी। सरकार इस बात से भलीभांति वाकिफ है कि किसानों के सामने झुकने या कृषि से संबंधित तीनों कानूनों को वापस लेने का मतलब अपने गले में राजनीतिक रस्सी फंसाना है। अगर किसी कानून का कोई प्रावधान भी खत्म होता है या उसमें बदलाव किया जाता है तो वह विपक्ष के लिए एक संजीवनी का काम करेगा।
केंद्र सरकार और किसानों के बीच होने वाली बातचीत को लेकर भाजपा के रणनीतिकारों का कहना है कि आप निश्चिंत रहें, मामले का समाधान निकल रहा है। किसानों को निराश नहीं करेंगे। किसान बहुत जल्द आंदोलन खत्म कर देंगे। इस आंदोलन को लेकर भाजपा ने राजनीति नहीं की। यह सब जानते हैं कि कौन राजनीति कर रहा है। इससे पहले सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद व प्रकाश जावड़ेकर भी यह इशारा कर चुके हैं कि सरकार न तो कानूनों में बदलाव करेगी और न ही उन्हें वापस लेगी। किसानों को गुमराह किया जा रहा है।विपक्ष इस आंदोलन को लेकर अब आगे बढ़ने की रणनीति बना रहा था।
विपक्ष के अनेक प्रयासों के बाद भी इस आंदोलन में पंजाब और पश्चिमी उत्तरप्रदेश से ही किसानों के जत्थे पहुंचे। इस आंदोलन में हरियाणा और राजस्थान के किसानों की भूमिका बहुत छोटी रही है।यही वजह है कि अब हरियाणा की खापों के जरिए इस आंदोलन को बड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। हरियाणा के एक खाप नेता ने सरकारी पद से इस्तीफा दे दिया है। भाजपा के एक नेता ने कहा, आंदोलन खत्म होने के बाद कई खुलासे होंगे।लोगों को इन सवालों का जवाब भी मिलेगा कि किसने आंदोलन को गलत दिशा में ले जाने का प्रयास किया है। यह तय है कि सरकार, किसानों के सामने नहीं झुकेगी।कृषि सुधार से जुड़े तीनों कानूनों का वापस नहीं लिया जाएगा।एमएसपी को लेकर मौजूदा व्यवस्था में बदलाव किया जा सकता है।
इस बाबत कोई नई घोषणा हो सकती है।ये घोषणा भी एमएसपी में सुधार करने तक सीमित रहेगी।बाकी मांगों पर सरकार किसानों को समझाने का प्रयास करेगी।अगर बातचीत टूटने के कगार पर पहुंचती है तो किसी कमेटी का गठन किया जा सकता है। इसमें सरकार और कृषि विशेषज्ञों के अलावा किसानों के प्रतिनिधियों को भी शामिल कर सकते हैं। किसानों का एक बड़ी शिकायत रही है कि केंद्र सरकार ने तीन कानून बनाने से पहले किसानों या उनके प्रतिनिधियों से कोई बात नहीं की।किसानों को भरोसे में नहीं लिया गया।जानकारों का कहना है कि केंद्र सरकार झुकने का मैसेज तो बिल्कुल नहीं देगी।अगर एक बार सरकार पीछे हटी तो उसके लिए मुसीबतों की नई राह तैयार हो जाएगी।
विपक्ष उसे अपनी जीत में बदलने का प्रयास करेगा।अगर कानून वापस हुआ तो अनुच्छेद 370 जैसे प्रावधानों पर भी सवाल उठने लगेंगे।इसके अलावा कई दूसरे कानून, जिनका विपक्ष ने जोरदार तरीके से विरोध किया था, उन्हें लेकर भी सरकार घिर जाएगी।भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा, किसान प्रतिनिधि तीन कानूनों में बदलाव को लेकर अपना पक्ष रखेंगे।नए कानूनों से किसानों को नुकसान हो रहा है।इसके प्रावधानों का अच्छे से अध्ययन किया गया है।बिजली बिल को लेकर भी बातचीत होगी।