केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि सेना की जज एडवोकेट जनरल (जेएजी) शाखा में विवाहित महिलाओं की नियुक्ति पर रोक के बाद अब विवाहित पुरुषों की नियुक्ति भी बंद कर दी है। सरकार का कहना है कि शादीशुदा उम्मीदवारों की भर्ती करने से खर्च बढ़ेगा। सरकार की दलील है कि वैवाहिक जिम्मेदारियों के चलते ऐसे उम्मीदवार प्रशिक्षण नहीं लेंगे, तो उनकी जगह दूसरे सैनिकों को रखना पड़ेगा।
दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष सरकार ने एक जनहित याचिका पर यह जवाब दिया है। याचिका में शादीशुदा महिलाओं के जेएजी शाखा में नियुक्त न करने का विरोध किया गया है। याचिका में यह कहा गया है कि केवल विवाहित महिलाओं के साथ ऐसा करना उनके प्रति भेदभाव है। इस मामले की अगली सुनवाई 21 मई को होगी।
याचिकाकर्ता कुश कालरा की तरफ से पेश एडवोकेट चारु वाली खन्ना ने कहा कि यह सख्ती पहले महिलाओं पर ही थी लेकिन याचिका दायर करने के बाद इसे शादीशुदा पुरुषों के लिए भी लागू कर दिया गया। यह याचिका मई, 2016 में दायर की गई थी। उसके बाद सेना ने महिलाओं के साथ
शादीशुदा पुरुषों को भी जेएजी शाखा में नियुक्त न करने की बात साफ कर दी थी। सरकार ने हलफनामे में कहा है कि इस शाखा में नियुक्ति के बाद शादी करने पर कोई पाबंदी नहीं है। यह रोक केवल प्रशिक्षण व सेवा के पहले वर्ष के लिए है।
तब नियम लागू होता, तो नहीं मिलते योग्य उम्मीदवार
जनहित याचिका दायर होने से पहले शादीशुदा पुरुषों की नियुक्ति करने के मामले पर सरकार ने कहा कि उक्त नियम 1960-70 के दशक का था। उस समय युवकों की शादी कम उम्र में हो जाती थी। अगर तब यह नियम लागू किया जाता, तो योग्य उम्मीदवारों की संख्या आधी रह जाती।
महिलाओं की काबिलियत का किया जिक्र
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान गणतंत्र दिवस परेड में महिलाओं की काबिलियत का जिक्र भी किया जहां
महिला फाइटर पायलेट और बीएसएफ की महिला बाइकर दल ने शानदार प्रदर्शन किया था। साथ ही उन्होंने सेना को आपत्तियों के जवाब में हलफनामा जमा करने की बजाय कोई वैधानिक कदम उठाने की सलाह दी। कोर्ट ने यह भी कहा कि गणतंत्र दिवस समारोह में महिलाओं की काबिलियत देखी गई है तो ऐसे में उनकी भर्ती पर आपत्ति कैसे जताई जा सकती है।