उच्चतम न्यायालय ने यह आधार लिया कि आरक्षण के प्रयोजन के लिए कॉडरों को नहीं मिलाया जा सकता। तथापि विभिन्न केंद्रीय विश्वविद्यालयों में संकाय सदस्यों की सात हजार से अधिक रिक्तियों की भर्ती की प्रक्रिया पूर्णत: रुक गई थी। इस प्रकार शिक्षण प्रक्रिया और शैक्षणिक मानकों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।
इसमें कहा गया कि रिक्त पदों को भरने की जरूरत को ध्यान में रखते हुए और अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियों और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गो के हितों की सुरक्षा के लिये इस मामले में एक कानून की जरूरत थी। ऐसे में ‘केंद्रीय शैक्षणिक संस्था (शिक्षकों के काडर में आरक्षण) विधेयक-2019’ लाया गया।
इसमें केंद्र सरकार द्वारा स्थापित, अनुरक्षित या सहायता प्राप्त कतिपय केंद्रीय शैक्षणिक संस्थाओं में शिक्षकों के काडर में अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गो से संबंधित व्यक्तियों की सीधी भर्ती द्वारा नियुक्तियों में पदों के आरक्षण का उपबंध करने के लिए और उक्त आरक्षण को संविधान 103वां संशोधन अधिनियम 2019 की दृष्टि से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गो तक बढ़ाने का उपबंध किया गया है ।
विधेयक के खंड 3 में यह उपबंध किया गया है कि पदों में आरक्षण का विस्तार और रीति केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित की जाएगी और पदों के आरक्षण के प्रयोजन के लिए किसी केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान को एकल इकाई के रूप में समझा जाएगा। विधेयक के खंड 3 के उपबंध अनुसूचि में निर्दिष्ट उत्कृष्ट संस्थाओं, अनुसंधान संस्थाओं, राष्ट्रीय और रणनीतिक महत्व की संस्थाओं या अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं में लागू नहीं होंगे।