दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा है कि देश के लिए जाने देने वाला हर इंसान शहीद होता है। उसे समाज याद करता है और ऐसे में उसे सरकार की ओर से शहीद घोषित करने वाले सर्टिफिकेट की तरह किसी पहचान की जरूरत नहीं होती।
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी अर्धसैनिक बल और पुलिस के जवानों की ड्यूटी के दौरान मौत पर उन्हें भी सशस्त्र सेना के जवानों की तरह शहीद का दर्जा देने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की।
जस्टिस इंद्रा बनर्जी और जस्टिस वी कामेश्वर राव की पीठ ने कहा कि सरकार के मुताबिक तीनों सेना में ‘शहीद’ जैसा कोई शब्द नहीं होता और न ही रक्षा मंत्रालय ने ड्यूटी के दौरान जान गवाने वाले जवानों को ‘शहीद’ करार देने का कोई आदेश या अधिसूचना जारी किया है। इसी तरह गृह मंत्रालय ने भी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल और असम राइफल के लिए इस बारे में कोई आदेश जारी नहीं किया है। इन तर्कों के साथ हाईकोर्ट ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि केंद्र सरकार के लिए अदालत की ओर से कोई निर्देश जारी करने की जरूरत नहीं है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार से सातवें वेतन आयोग के सुझावों के मुताबिक ड्यूटी के दौरान मौत पर सशस्त्र सेना की तरह अर्धसैनिक बलों व पुलिसकर्मियों को भी शहीद का दर्जा दिए जाने पर विचार करने को कहा।
जस्टिस अशोक कुमार माथुर आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि ड्यूटी पर मौत पर अर्धसैनिक बल के जवानों को भी शहीद का दर्जा दिया जा सकता है। अदालत ने केंद्र को निर्णय लेने के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की है।