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देश के लिए जान देने वाला हर इंसान शहीद: दिल्ली हाईकोर्ट

Tue, 18 Oct 2016 10:42 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, नई दिल्ली
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द‌िल्ली उच्च न्यायालय
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा है कि देश के लिए जाने देने वाला हर इंसान शहीद होता है। उसे समाज याद करता है और ऐसे में उसे सरकार की ओर से शहीद घोषित करने वाले सर्टिफिकेट की तरह किसी पहचान की जरूरत नहीं होती।
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हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी अर्धसैनिक बल और पुलिस के जवानों की ड्यूटी के दौरान मौत पर उन्हें भी सशस्त्र सेना के जवानों की तरह शहीद का दर्जा देने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

जस्टिस इंद्रा बनर्जी और जस्टिस वी कामेश्वर राव की पीठ ने कहा कि सरकार के मुताबिक तीनों सेना में ‘शहीद’ जैसा कोई शब्द नहीं होता और न ही रक्षा मंत्रालय ने ड्यूटी के दौरान जान गवाने वाले जवानों को ‘शहीद’ करार देने का कोई आदेश या अधिसूचना जारी किया है। इसी तरह गृह मंत्रालय ने भी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल और असम राइफल के लिए इस बारे में कोई आदेश जारी नहीं किया है। इन तर्कों के साथ हाईकोर्ट ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि केंद्र सरकार के लिए अदालत की ओर से कोई निर्देश जारी करने की जरूरत नहीं है।
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हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार से सातवें वेतन आयोग के सुझावों के मुताबिक ड्यूटी के दौरान मौत पर सशस्त्र सेना की तरह अर्धसैनिक बलों व पुलिसकर्मियों को भी शहीद का दर्जा दिए जाने पर विचार करने को कहा।

जस्टिस अशोक कुमार माथुर आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि ड्यूटी पर मौत पर अर्धसैनिक बल के जवानों को भी शहीद का दर्जा दिया जा सकता है। अदालत ने केंद्र को निर्णय लेने के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की है। 
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'जान कुर्बान करने वाले किसी पहचान के मोहताज नहीं'

शहीदों को श्रद्धांजल‌ि - फोटो : Amar Ujala
याचिकाकर्ता अधिवक्ता अभिषेक चौधरी ने अदालत में तर्क दिया था कि सीमा पर देश की रक्षा करने के दौरान जान कुर्बान करने वाले अर्धसैनिक बल के जवानों को शहीद का दर्जा नहीं देना उनके प्रति अन्याय है। इन्हें भी सशस्त्र सेना के जवानों के सामान मुआवजा व अन्य सुविधाएं दी जानी चाहिए।

याचिका में बताया गया है कि पिछले 53 सालों में 31,895 अर्धसैनिक बलों व पुलिसकर्मियों की ड्यूटी के दौरान मौत हो चुकी है, बावजूद इसके उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया गया। इससे पूर्व केंद्र सरकार ने अदालत में कहा था कि अर्धसैनिक बलों के जवान को ड्यूटी पर मारे जाने पर शहीद का दर्जा प्रदान नहीं किया जा सकता। शहीद का दर्जा देने की अलग प्रक्रिया है और ऐसे जवानों के परिवार को कई अन्य सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। 

जान कुर्बान करने वाले किसी पहचान के मोहताज नहीं 
अदालत ने कहा कि जान कुर्बान करने वाले व्यक्ति के त्याग को समाज याद करता है। आप अपनी जान देते हैं तो इसका मतलब है आप शहीद हुए हैं। इसके अलावा किसी से और कोई पहचान की जरूरत नहीं है। 
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