केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि यदि एसआईटी के दो सदस्य 1984 सिख दंगा मामलों की जांच की निगरानी जारी रखते हैं तो उसे इस पर कोई आपत्ति नहीं है। साथ ही उसने कहा कि तीन सदस्यीय एसआईटी से अलग हुए सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी राजदीप सिंह की जगह किसी अन्य की नियुक्ति जरूरी नहीं है।
सिंह ने निजी कारणों से एसआईटी से अलग होने का फैसला किया है। तीन सदस्यीय एसआईटी सिख दंगों के 186 मामलों की जांच की निगरानी कर रही है। इसके दो अन्य सदस्य दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस एसएन ढींगरा और आईपीएस अधिकारी अभिषेक दुलार हैं।
जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा कि 11 जनवरी के आदेश के तहत तीन सदस्यीय एसआईटी बनाने का फैसला तीन सदस्यीय पीठ ने लिया था। ऐसे में दो जजों की पीठ इसे संशोधित नहीं कर सकती है। पीठ ने मामले को मंगलवार को सुनवाई के लिए टाल दिया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील एचएस फुलका ने कहा कि अगर एसआईटी में दो सदस्य भी रहे तो कोई दिक्कत नहीं है।
इस प्रस्ताव पर केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने कहा कि उन्हें सुझाव पर कोई आपत्ति नहीं है। इससे पहले उन्होंने पीठ से कहा कि राजदीप सिंह की जगह पूर्व आईपीएस अधिकारी नवनीत रंजन वासन को सदस्य बनाया जा सकता है। इस पर पीठ ने कहा कि आप अपनी मर्जी का सदस्य नहीं चुन सकते। इस पर उन्होंने कहा कि अदालत किसी भी व्यक्ति को अपने हिसाब से सदस्य चुन सकती है।