केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि भारत का संविधान हर व्यक्ति को अपने धर्म का स्वतंत्रतापूर्वक पालन करने का अधिकार देता है। हालांकि, इसमें किसी को भी अन्य लोगों को किसी विशेष धर्म में परिवर्तित करने का मौलिक अधिकार शामिल नहीं है। इसलिए, महिलाओं, आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े और समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए अवैध धर्मांतरण के खिलाफ सख्त कानून आवश्यक है।
नौ राज्यों में पहले से है कानून
केंद्र ने कहा, ऐसे मामलों पर रोक लगाने के लिए नौ राज्यों में कानून है। इसमें- ओडिशा, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक व हरियाणा शामिल हैं। यहां धर्मांतरण कानून बना हुआ है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि महिलाओं व आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए इस तरह के अधिनियम आवश्यक हैं।
कानून बनाने के लिए दाखिल की गई थी याचिका
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में जबरन धर्मांतरण के खिलाफ याचिका दायर की गई है। वकील अश्विनी उपाध्याय ने याचिका में इस पर कानून बनाकर रोकने की मांग की थी। कहा गया है कि इसे रोकने के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को कड़े कदम उठाने होंगे। याचिका में दावा किया गया है कि देश में काला जादू, अंधविश्वास, चमत्कार आदि के जरिये जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाएं हर हफ्ते सामने आती हैं। एक भी जिला ऐसा नहीं है, जो धोखाधड़ी व धमकी से धर्मांतरण से मुक्त हो।
धर्म की आजादी, जबरन धर्म परिवर्तन की नहीं
इस मामले में 14 नवंबर को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धर्म की आजादी हो सकती है, लेकिन जबरन धर्म परिवर्तन की कोई स्वतंत्रता नहीं है। संविधान के तहत धर्मांतरण कानूनी है, पर जबरन नहीं हो सकता। इस मामले में कोर्ट ने केंद्र से जवाब दाखिल करने के लिए कहा था।
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बहस के बाद अनुच्छेद 25 में आया ‘प्रचार’
सरकार ने आगे कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत आने वाले ‘प्रचार’ शब्द के अर्थ और तात्पर्य पर संविधान सभा में विस्तार से चर्चा और बहस हुई थी। संविधान सभा की ओर से इस स्पष्टीकरण के बाद ही इस शब्द को शामिल किया गया था कि अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार में धर्मांतरण का अधिकार शामिल नहीं होगा। केंद्र सरकार ने कहा कि शीर्ष अदालत ने माना है कि प्रचार शब्द किसी व्यक्ति को धर्मांतरित करने के अधिकार की परिकल्पना नहीं करता है।
जबरन धर्मांतरण को सुप्रीम कोर्ट भी बता चुका है गंभीर
सुप्रीम कोर्ट ने बीते 14 नवंबर को इस मामले में सुनवाई के दौरान भी कहा था कि जबरन धर्म परिवर्तन बहुत ही गंभीर मुद्दा है और यह देश की सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता है। अदालत ने केंद्र से इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करने को भी कहा था।