देश में जारी जनगणना के नतीजे आने के बाद शहरों की असली तस्वीर सामने आएगी। संसद की संसदीय समिति ने आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय से कहा है कि वर्तमान में 3,000 से अधिक शहर या कस्बे शहरी विशेषताएं तो रखते हैं, लेकिन अब भी ग्रामीण स्थानीय निकायों के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए। शहर की मौजूदा परिभाषा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। आजादी के सौवें वर्ष तक शहरी आबादी 87 करोड़ तक होने की उम्मीद है।
मंत्रालय ने शहरीकरण की बदलती जरूरतों को देखते हुए बस्ती वर्गीकरण व्यवस्था में 'संक्रमणकालीन क्षेत्र' (ट्रांजिशनल एरिया) की नई श्रेणी बनाने का प्रस्ताव दिया है। इससे उन क्षेत्रों की पहचान और नियोजन आसान हो सकता है, जहां आबादी और आर्थिक गतिविधियां तो शहरी स्वरूप ले रही हैं, लेकिन उन्हें अभी शहर का दर्जा नहीं मिला है। भारत के महापंजीयक व जनगणना आयुक्त कार्यालय ने कहा है, मौजूदा जनगणना डिजिटल तरीके से हो रही है। आंकड़ों को अंतिम रूप दिए जाने के बाद गांव व शहरों के आंकड़ों से सीमाओं का विश्लेषण कर अर्धशहरी या संक्रमणकालीन बस्तियों की पहचान की जा सकती है। लेकिन इस वक्त जनगणना के बीच अर्ध शहरी क्षेत्रों की नई श्रेणी शुरू करना संभव नहीं है।
वर्ष 2025 में भारत की शहरी आवादी लगभग 45 से 50 करोड़ के बीच होने का अनुमान था। वहीं, 2047 तक इसके बढ़कर 85 से 87 करोड़ होने की संभावना है। मंत्रालय का कहना है कि नए शहरी क्षेत्रों का विकास हाई स्पीड रेल नेटवर्क, क्षेत्रीय तीव्र पारगमन प्रणाली और प्रमुख एक्सप्रेसवे जैसे परिवहन एवं आर्थिक गलियारों के आसपास होने की संभावना है।
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क्या होते हैं जनगणना नगर व वैधानिक नगर
5,000 आबादी, 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या घनत्व वाला क्षेत्र जनगणना नगर कहलाता है। यहां मुख्य कामगारों में पुरुष के कम से कम 75 प्रतिशत गैर-कृषि गतिविधियों में शामिल रहना जरूरी शर्त है। वैधानिक नगर में नगर निगम, नगरपालिका, छावनी बोर्ड और अधिसूचित क्षेत्र समितियां शामिल हैं।
इन्हें राज्य सरकारें अधिसूचित करती हैं।
संसदीय समिति की सिफारिशें
संसदीय समिति ने कहा, शहर की परिभाषा में बदलाव की जरूरत है। सरकार लैंगिक पक्षपाती मानदंड में संशोधन के लिए एक केंद्रित अध्ययन कराए और शहरी क्षेत्रों की पहचान हेतु लैंगिक-समावेशी कार्यप्रणाली विकसित करे।