चीन और भारत के संबंधों को लेकर अक्सर चर्चाएं होती हैं। देश की आजादी के बाद बीते 78 वर्षों में चीन के प्रति भारत सरकार की नीति क्या रही है? इस विषय पर भूराजनीतिक मामलों के जानकारों के साथ-साथ सामरिक विषयों की समझ रखने वाले विशेषज्ञों की भी रूचि रही है। चीन के साथ पंचशील समझौते की जरूरत और इसके पीछे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू क्या सोचते थे? इस सवाल पर भारत के मौजूदा सर्वोच्च सैन्य अधिकारी जनरल अनिल चौहान ने बयान दिया है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) अनिल चौहान ने उत्तराखंड के देहरादून में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहा, 'नेहरू को शायद इस बात की जानकारी थी कि पूर्वोत्तर भारत में मैकमोहन लाइन जैसी कोई चीज अस्तित्व में है। शायद इसी कारण उन्होंने पंचशील समझौता करने का फैसला लिया।'
पंचशील समझौते पर चीन का रूख भारत से अलग था
चीन को लेकर आजाद भारत की पहली सरकार की नीतियों का जिक्र होने पर जनरल चौहान ने कहा कि साल 1954 में तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में मान्यता दी और दोनों पड़ोसी देशों ने पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसे भारत ने औपचारिक संधि के माध्यम से उत्तरी सीमा पर हुए विवाद के स्थायी समाधान की तरह देखा। जनरल चौहान ने कहा, चीन का रूख भारत से अलग था। उनका मानना था कि यह समझौता केवल व्यापार के लिए किया गया था और इसे भारत से लगने वाली सीमा को लेकर चीन का रूख नहीं माना जा सकता है।
पंडिच नेहरू पंचशील समझौते पर आगे क्यों बढ़े?
सीडीएस चौहान ने भारत पर ब्रिटिश हुकूमत का जिक्र करते हुए कहा, अंग्रेज चले गए। उन्हें एक दिन जाना ही था। भारत को तय करना था कि हमारा मोर्चा कहां है। नेहरू शायद इस बात को जानते थे कि सीमा से सटे इलाके में मैकमोहन रेखा जैसी कोई चीज है जिससे हमारी सीमा तय होती है। लद्दाख क्षेत्र में हमारा कुछ दावा था, लेकिन पूर्वी इलाके में नहीं। शायद यही कारण है कि नेहरू पंचशील समझौते के लिए आगे बढ़ना चाहते थे।
890 किलोमीटर लंबी सीमा- मैकमोहन लाइन
गौरतलब है कि आज भी हिमालय के दुर्गम इलाकों में भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को लेकर हालात संवेदनशील बने हुए हैं। सीडीएस ने जिस मैकमोहन रेखा का जिक्र किया है इसे ब्रिटिश हुकूमत में भारत और तिब्बत के बीच 890 किलोमीटर लंबी सीमा की तरह देखा गया था।
चीनी लोगों ने तथाकथित रूप से तिब्बत को मुक्त कराया
जनरल चौहान ने चीन की मौजूदा नीति और तिब्बत की तथाकथित मुक्ति के बाद चीन अब इस क्षेत्र में स्थिरता चाहता है। उन्होंने कहा कि चीनी लोगों ने तथाकथित रूप से तिब्बत को मुक्त करा लिया था। वे ल्हासा और शिनजियांग चले गए थे। ये इलाका दोनों तरफ से सीमावर्ती इलाके थे। इसलिए शायद इस विशेष इलाके में चीन स्थिरता चाहता था। यही कारण है कि इस भूभाग की अहमियत हर दौर में बनी रही। चीन इसे प्राथमिकता देता रहा।
भारत और चीन के बीच मौजूद हिमालयी बरफ जोन गायब!
सीडीएस चौहान ने कहा कि ब्रिटिश हुकूमत खत्म होने के बाद आजाद भारत चीन के साथ अच्छे संबंध बनाने के लिए उत्सुक था। 1949 में स्वतंत्र होने के बाद चीन ने न तो एन्क्लेव पर अपने दावे से जुड़े बिंदुओं पर आगे वार्ता की पहल की और न ही अंग्रेजों से विरासत में मिले विशेषाधिकारों को छोड़ने के लिए राजी हुआ। सीडीएस चौहान ने कहा कि तिब्बत पर चीन ने कब्जा कर लिया। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में चीन को स्थायी सीट दिए जाने की पैरवी की। इसके बाद भारत और चीन के बीच मौजूद हिमालयी बरफ जोन गायब हो गया। 1954 में भारत ने तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में मान्यता दे दी। दोनों देशों ने पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके साथ ही भारत ने यह भी मान लिया कि उसने अपनी सीमा, उत्तरी सीमा और एक मात्र ऐसे इलाके को लेकर विवाद बिना किसी औपचारिक संधि के माध्यम से ही सुलझा लिया है।
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छह दर्रों की पहचान करके सीमांकन किया गया
बकौल जनरल चौहान, भारत के लिए सीमा की वैधता अब पंचशील समझौते पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि चीन से लगी सीमा को लेकर भारत का मानना था कि छह दर्रों की पहचान करके सीमांकन किया गया था। हमारा मानना था कि इन छह दर्रों- शिपकी ला, माना, नीति, किंगरी-बिंगरी, लिपुलेख और धर्म के माध्यम से व्यापार होगा या तीर्थयात्री जाएंगे। हालांकि, चीन ने स्पष्ट किया कि पंचशील समझौते का सीमा पर उसके रुख से कोई लेना-देना नहीं है।
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कब तनावपूर्ण रहे भारत-चीन संबंध, दोनों ताकतों के बीच शांति बरकरार रहना क्यों अहम?
दरअसल, सीडीएस जनरल चौहान के बयान की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि चीन और भारत के बीच रिश्ते हमेशा से सामान्य नहीं रहे हैं। चाहे पंडित नेहरू के कार्यकाल में 1962 के युद्ध की घटना हो या इसके दशकों बाद मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में डोकलाम और पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग झील के पास गलवां घाटी में उपजे तनाव का मामला। दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आईं इस कारण एशिया की दो महाशक्तियों के बीच टकराव की आशंका बढ़ी और इसके वैश्विक असर को भांपते हुए अमेरिका और रूस जैसे देशों ने भी दोनों से संयम बरतने की अपील की थी। गलवां घाटी में भारत के 20 सैनिकों ने बलिदान दिया, जबकि चीनी सेना को भी बड़ा नुकसान झेलना पड़ा। हालांकि, चीन ने अभी तक हताहत सैनिकों की संख्या विश्वसनीय रूप से स्वीकार नहीं की है।
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