आलोक वर्मा:
राकेश अस्थाना व अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज होने से पहले ही उन्हें इशारे में सूचित कर दिया गया था कि इस केस में रॉ के लिए काम करने वाले एजेंट भी हैं, इसलिए वे इस केस में बहुत गहराई से अध्ययन करने के बाद ही आगे बढ़े। सूत्रों की माने तो मनोज प्रसाद और सोमेश प्रसाद के अलावा कई अन्य लोग रॉ की मदद कर रहे थे। मनोज प्रसाद ने तो रॉ के कई बडे टॉस्क पूरे किए थे। उसने पाक के पूर्व राष्ट्रपति को लेकर कई अहम जानकारियां हासिल की थी। साथ ही देश के कई बड़े नौकरशाह, जो विदेशों में अपने भारी निवेश को लेकर सरकार के निशाने पर थे, उनकी सूचनाएं भी एजेंसी को दी थी। कई बार ये एजेंट हनी ट्रैप की मदद से उनके खातों की जानकारी लेते थे। वर्मा ने इन बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया।
राकेश अस्थाना:
इन्होंने ईडी के अधिकारी राजेंद्र पाल उपाध्याय (आईपीएस), राजेश्वर सिंह (आईपीएस) और विकास मेहता का नाम विदेशी सिमकार्ड इस्तेमाल करने के मामले में सार्वजनिक कर दिया। राकेश अस्थाना ने आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी और कैबिनेट सचिव को जो शिकायत दी थी, उसमें यह बात लिखी थी कि उक्त तीनों अधिकारी नेपाल के सिमकार्ड का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने यहां तक लिख दिया कि राजेश्वर सिंह के दुबई निवासी दानिश शाह के साथ संबंध हैं।
अस्थाना के पत्र में शाह को कथित तौर से पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी (आईएसआई) का एजेंट बताया गया था। इस मसले पर राजेश्वर सिंह के खिलाफ कार्रवाई को लेकर वित्त मंत्रालय और तत्कालीन ईडी निदेशक करनैल सिंह के बीच तीखी नौंक-झौंक हो गई थी। करनैल सिंह के हस्तक्षेप के चलते राजेश्वर सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। बताया गया कि उनके बीच प्रोफेशनल रिश्ते थे, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। बाद में पता चला कि शाह ने ईडी के कई मामले सुलझाने में जांच एजेंजी की मदद की है।
सीबीआई बिल्डिंग की 11 वीं मंजिल पर इन दोनों अफसरों का एक ही वेटिंग रुम है। यानी जिस किसी डायरेक्टर से जो कोई मिलने के लिए आता तो वह इसी वेटिंग रुम का इस्तेमाल करता था। यहीं पर दोनों निदेशकों का निजी स्टाफ भी तैनात रहता था, जो आने-जाने वालों के बारे में पूरी जानकारी अपने-अपने बॉस की टेबल तक पहुंचा देता। इसके अलावा लोधी कालोनी के प्रगति विहार स्थित सीबीआई दफ़्तर में भी रुम को लेकर इनके बीच लगातार तनातनी चलती रही है। चूंकि पहले सीबीआई में केवल निदेशक का ही पद होता था तो इसलिए वेटिंग रुम भी एक ही बनाया गया था।
राकेश अस्थाना के स्पेशल डायरेक्टर बनने के बाद यहां पर वेटिंग रुम का झगड़ा शुरू हुआ। सीबीआई के सूत्रों का कहना है कि जो भी बाहरी व्यक्ति इन दोनों निदेशकों से मिलने के लिए आता तो वहां मौजूद स्टाफ उसकी सारी जानकारी ले लेता था। आगुन्तक को यह पता नहीं लगता था कि कौन सा स्टाफ किस निदेशक का है, ऐसे में वह अपने बारे में सभी तरह की जानकारी दे देता था।
राकेश अस्थाना का आरोप, वर्मा मुझे फंसाने के लिए लंबे समय से चाल चल रहे थे
स्पेशल डायरेक्टर (सीबीआई) राकेश अस्थाना ने आरोप लगाया कि आलोक वर्मा मुझे फंसाने के लिए लंबे समय से तैयारी कर रहे थे। मोईन कुरैसी मामले की आड़ में उन्होंने वडोदरा, सूरत और अहमदाबाद में रेड डलवाई। बतौर राकेश अस्थाना, वर्मा ने अपने चहेते अफसरों को यह हिदायत दे रखी थी कि चाहे जैसे भी, कुछ भी हो, मगर अस्थाना के खिलाफ निकाल कर लाओ। अस्थाना ने 19 अक्तूबर को सीवीसी और कैबिनेट सचिव को लिखे अपने पत्र में भी इन सब बातों का जिक्र किया था।
- सीबीआई निदेशक ने शरारती एवं नियम तोड़ने वाले डीएसपी अजय बस्सी को अपना चहेता क्यों बनाया
- आलोक वर्मा, राजेश्वर सिंह व कई दूसरे अफसर मेरी छवि खराब करने में लगे हुए थे
- आलोक वर्मा और ईडी के ज्वाइंट डायरेक्टर राजेश्वर सिंह ने मेरे खिलाफ मीडिया में कई तरह के दस्तावेज लीक किए हैं।
- 24 सितंबर को लिखे पत्र में अस्थाना ने कहा, मेरे खिलाफ चल रहे इस दुष्प्रचार के माहौल में मैं अपनी डयूटी पूरी नहीं कर सकता।
- आलोक वर्मा मेरा करियर नष्ट कर देना चाहते हैं।अस्थाना ने लिखा है कि यह भी अंदेशा है कि वे मुझे किसी झूठे केस में फंसवाने की तैयारी कर रहे हैं।
- मोईन कुरैशी मामले में जांच अधिकारी, एसआईटी के एसपी और ज्वाइंट डायरेक्टर ने सतीश बाबू सना की गिरफ्तारी के लिए सिफ़ारिश की थी। स्पेशल निदेशक अस्थाना ने भी इस फाइल पर अपनी मुहर लगाकर इसे 20 सितंबर को निदेशक आलोक वर्मा के पास भेज दिया।वर्मा ने सीबीआई के तय नियमों का उल्लंघन कर इस फाइल को कानूनी मामलों के निदेशक ओपी वर्मा के सुपुर्द कर दिया। उसमें वर्मा ने कुछ लाइनें भी लिखी, जिनका साफ मतलब था कि सतीश को गिरफ़्तार न किया जाए।
ये सब मामले भी जनता के सामने आ गए
- अस्थाना का आरोप, वर्मा इन सात केसों में भी गलत इरादे से हस्तक्षेप कर रहे थे। इनमें संदेसरा ग्रुप आईटी अफ़िशल, संदेसरा ग्रुप बीएस-एफएस नई दिल्ली, उपेंद्र राय एवं अन्य, राकेश तिवारी एवं अन्य, दीपेश चांडक एवं अन्य, ईओ-2 शाखा के अज्ञात अधिकारी आदि मामले शामिल हैं।
- आरोप है कि वर्मा ने बीएनआर होटल केस, जो कि लालू प्रसाद यादव के खिलाफ दर्ज हुआ था, के मुख्य संदिग्ध को एफआईआर से बाहर करा दिया।खास बात है कि आरोपी का नाम एफआईआर में शामिल करने के लिए आईओ, एसपी, डीआईजी, जेडी और एडीशनल डायरेक्टर सीबीआई ने भी सिफारिश की थी।
- अस्थाना ने अपने पत्र में लिखा है कि वर्मा ने सतीश बाबू को इस केस में राहत देने के लिए उससे दो करोड़ रुपये लिए हैं। बदले में उसकी गिरफ़्तारी नहीं हुई और पूछताछ में भी छूट मिल गई।
- सीबीआई निदेशक ने ईडी के अधिकारी एनबी सिंह को काफी राहत दी है। पूछताछ के दौरान उसका मोबाइल फ़ोन तक नहीं लिया गया।
- बीएसएफ के डीजी केके शर्मा की सिफारिश पर आईपीएस राजीव कष्णा को सीबीआई में लिया गया।उनकी पत्नी मीनाक्षी आईआरएस अधिकारी हैं और ईडी के ज्वाइंट डायरेक्टर राजेश्वर सिंह की बहन हैं।
- अस्थाना का आरोप है कि दिल्ली के पुलिस आयुक्त रहते हुए वर्मा ने सोने की तस्करी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने दी, यह एयरपोर्ट का मामला है।
- 30 जनवरी 2018 को सीबीआई ने बीएसएफ के एक कमांडेंट के खिलाफ पशु तस्करी का केस दर्ज किया था। सीबीआई ने कमांडेंट जेबू डी मैथ्यू के पास से 45.65 लाख रुपये भी बरामद कर लिए। जांच में सामने आया कि यह राशि उसने बांग्लादेश के पशु तस्करों से ली है। वर्मा ने बीएसएफ के अफसर का पूरा बचाव किया।
- हरियाणा के नागली उमरपुर और टिगरा उल्लावास में जमीन अधिग्रहण केस में 36 करोड़ रुपये की कथित तौर पर घूस दी गई थी।बताया गया है कि इस मामले से जुड़े अधिकारी टीसी गुप्ता, कंपनी मालिक ललित गुप्ता, सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर अरुण कुमार और डायरेक्टर आलोक वर्मा के बीच कथित तौर पर जबरदस्त लाइजनिंग रही है।