सीबीआई में शीर्ष स्तर पर जारी घमासान के चलते सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ उनके ही महकमे द्वारा की गई एफआईआर की वजह से अस्थाना प्रवर्तन निदेशालय का निदेशक बनते-बनते रह गए। प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी के निदेशक करनाल सिंह इसी महीने की 31 तारीख को सेवानिवृत्त होने वाले हैं।
उनकी जगह गुजरात कैडर के तेज तर्रार और कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के भरोसेमंद रहने वाले आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को प्रवर्तन निदेशालय का निदेशक बनाने की राय सरकार में शीर्ष स्तर पर बन चुकी थी लेकिन अचानक सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के निर्देश पर रिश्वत खोरी के एक कथित आरोप में अस्थाना के खिलाफ एफआईआर ने सारा खेल बिगाड़ दिया और मौजूदा ईडी निदेशक करनाल सिंह को कुछ महीनों के लिए सेवा विस्तार की संभावना बढ़ गई है। सिंह के सेवा विस्तार की फाईल प्रधानमंत्री कार्यालय में विचाराधीन है।
यह जानकारी देने वाले उच्च स्तरीय सूत्रों ने बताया कि गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना बेहद तेज तर्रार अधिकारी माने जाते हैं और उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का भरोसा तब से हासिल है जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री और शाह राज्य के गृह राज्य मंत्री थे। इसीलिए केंद्र में मोदी सरकार बनने के साथ ही अस्थाना की नियुक्ति सीबीआई में बतौर विशेष निदेशक हुई।
उन्हें सीबीआई में सबसे ताकतवर अधिकारी के तौर पर माना जाने लगा जिसे प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष दोनों का भरोसा मिला हुआ था। सीबीआई के एक सबसे वरिष्ठ अधिकारी ए.के. दत्ता की पदोन्नति और गृह मंत्रालय में चले जाने के बाद अस्थाना सीबीआई में निदेशक के बाद दूसरे नंबर के अधिकारी हो गए। सीबीआई के एक सबसे वरिष्ठ अधिकारी ए.के. दत्ता की पदोन्नति और गृह मंत्रालय में चले जाने के बाद अस्थाना सीबीआई में निदेशक के बाद दूसरे नंबर के अधिकारी हो गए।
इसीलिए बीच में जब सीबीआई निदेशक पद खाली हुआ तो अस्थाना को कुछ समय के लिए सीबीआई के निदेशक का कार्यभार भी सौंपा गया था। जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गई थी। अस्थाना की पीएमओ और भाजपा नेतृत्व से निकटता देखते हुए आम धारणा बन गई थी कि वही सीबीआई के अगले निदेशक होंगे। लेकिन निदेशक के साथ चल रहे उनके विवाद की वजह से उनकी राह आसान नहीं रह गई थी, इसलिए अस्थाना को ईडी में निदेशक बनाकर भेजने की राय उच्चस्तर पर बनी थी।
ईडी के सूत्रों के मुताबिक शिखर स्तर पर झगड़ा और मामला एक शीर्ष अधिकारी के खिलाफ रिश्वत खोरी के आरोप की एफआईआर तक हो जाने के बाद से सीबीआई की साख को जबर्दस्त धक्का लगा है। ऐसे में सरकार दूसरी केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय के बारे में बेहद सोच समझ कर फैसला लेगी और मुमकिन है कि कुछ महीनों के लिए मौजूदा निदेशक को सेवा विस्तार मिल जाए।
आलोक वर्मा की सीबीआई निदेशक पद पर नियुक्ति के बाद से ही अस्थाना और वर्मा के बीच तनातनी शुरु हो गई और सीबीआई अधिकारियों के बीच एक सीधी विभाजन रेखा खिंचती चली गई। दोनों शीर्ष अधिकारी एक दूसरे के खिलाफ आरोप लगाते हुए सरकार को पत्र लिखते रहे और जब अस्थाना ने सीवीसी में वर्मा के खिलाफ लिखित शिकायत की तो वर्मा ने सीवीसी को पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया कि अस्थाना सीबीआई की नुमाइंदगी नहीं करते हैं।
यह लड़ाई इस कदर तेज हो गई कि सियासी और सत्ता गलियारों में यहां तक कहा जाने लगा कि सरकार में उच्च स्तर पर भी इन दोनों अधिकारियों के पक्ष और विपक्ष में खेमेबंदी हो गई है। कहा जाने लगा कि पीएमओ के दो शीर्ष अधिकारियों की सहानुभूति आलोक वर्मा के साथ तो गुजरात कैडर के दो शीर्ष अधिकारियों की नजदीकी अस्थाना के साथ होने की वजह से यह लड़ाई और तेज होती जा रही है।
शुरू में प्रधानमंत्री ने इन दोनों अधिकारियों की लड़ाई को विभाग का आंतरिक मामला मानते हुए कोई दखल नहीं दिया, लेकिन अब पानी सिर के ऊपर आ जाने पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधा हस्तक्षेप करना पड़ा है और सरकार जल्दी ही राकेश अस्थाना के बारे में कोई फैसला ले सकती है।