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सीबीआई फिर बोतल से निकालेगी बोफोर्स घोटाले का जिन्न

Wed, 18 Oct 2017 11:35 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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1980 के दशक का बोफोर्स घोटाला केन्द्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) के  लिए अंतहीन जांच का सिलसिला बन चुका है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने एक बार फिर बोतल से घोटाले का जिन्न निकालने की तैयारी में है।
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जांच एजेंसी के प्रवक्ता अभिषेक दयाल ने कहा है कि जासूस माइकल हर्शमैन के टीवी चैनल पर इंटरव्यू से मिली नई जानकारियों पर गोर कर रही है। 

सीबीआई की इस दो लाइन के प्रेस वक्तव्य से साफ हैं कि जांच एजेंसी ने एक बार फिर घोटाले की जांच का मन बना लिया है। इसके लिए फिर से पड़ताल करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। 

ऐसा माना जा रहा है कि जल्द इस मामले में एफआईआर दर्ज करके जांच एजेंसी अपना काम शुरू कर देगी। केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने प्रेस वार्ता करके कहा है कि देश बोफोर्स घोटाले का सच जानना चाहता है। 
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उधर उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता अजय अग्रवाल का कहना है कि उन्होंने इसके लिए जांच एजेंसी को नये सबूत के साथ चिट्ठियां लिखी हैं। अग्रवाल का कहना है कि उच्चतम न्यायालय ने 12 साल बाद इस मामले को पुन: संज्ञान में लिया है। 18 अक्टूबर को भी अजय अग्रवाल ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को पत्र लिखा है और जांच एजेंसी द्वारा मामले की तह तक जाने का अनुरोध किया है। 

निजी जासूस हर्षमैन आए सामने
अमेरिकी निजी जासूसी एजेंसी फेयरफैक्स ने टीवी चैनल में इंटरव्यू देकर जांच में सहयोग करने की इच्छा जताई है। उन्होंने कहा कि वह इस मामले में भरोसेमंद प्रयास होने पर वह जांच में सहयोग कर सकते हैं। 

हर्शमैन निजी जासूसों के सम्मेलन को संबोधित करने के लिए भारत आए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि बोफोर्स घोटाले के सामने आने को बाद जब राजीव गांधी को स्विस बैंक में मोंट ब्लैंक खातों के बारे में पता चला तो वह काफी गुस्से में थे।

हर्शमैन के अनुसार तत्कालीन सरकार ने बोफोर्स घोटाले की जांच प्रक्रिया में बाधा डाला था। हर्शमैन के अनुसार बोफोर्स तोप घोटाले का पैसा स्विस बैंक में रखा गया था।

बोफार्स घोटाला बना जी का जंजाल
1987 में यह घोटाला सामने आया था और इसने विश्वनाथ प्रताप सिंह को भारतीय राजनीति का उस समय हीरो बना दिया था। इसके दम पर वह 1989 में देश के प्रधानमंत्री बनने में सफल रहे थे। इसमें 80 लाख डॉलर की रिश्वतखोरी का आरोप था। इसका खुलासा भी सबसे पहले स्वीडेन के रेडियो ने किया था। तब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे। 

इस घोटाले के मुख्य सूत्रधार इतालवी बिचौलिए अतावियो क्वात्रोकी थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर इस घोटाले में लिप्त होने का आरोप था। ऐसा आरोप है की राजीव गांधी परिवार के करीबी क्वात्रोकी ने रिश्वत खोरी की रकम लेने और सौदे को अमलीजामा पहनाने में बिचौलिए की भूमिका निभाई थी। इस सौदे के तहत 1.3 अरब डॉलर में तकनीकी हस्तांतरण के साथ स्वीडिश कंपनी बोफोर्स से 400 तोप ली जानी थी। 

कालांतर में मामले की जांच को लेकर संवेदनशील सीबीआई निदेशक जोगिन्दर सिंह ने इस मामले को करीब-करीब सुलझा लेने का दावा किया था। इसके लिए जांच एजेंसी को अतावियो क्वात्रोकी के प्रत्यर्पण तथा उससे पूछताछ का इंतजार था। इस मामले में तमाम दांव-पेंच चले। 

13 जुलाई 2013 को इटली के मिलान शहर में अतावियो क्वात्रोकी की दिल का दौरा पडऩे से मौत हो गई, लेकिन इस घोटाले से पर्दा नहीं उठ पाया। 1987 से अब तक करीब 30 साल से यह घोटाला कांग्रेस पार्टी के गले की फांस और विपक्ष का मजबूत हथियार बना है।

 
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बोफोर्स जांच और खर्च

बोफोर्स तोप - फोटो : ScoopWhoop
1987 में सामने आए बोफोर्स घोटाले की जांच के क्रम में 2011 के ब्यौरे के अनुसार 250 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके थे। अंतत: सीबीआई ने इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्णय ले लिया था।

1987 के बाद 11 महीने विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री रहे, उसके बाद चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। 1996 से मई 2004 तक केन्द्र में गैर भाजपा सरकार रही। इस दौरान भी बोफोर्स का मुद्दा खूब उछला, लेकिन जांच का कोई नतीजा नहीं निकला। मई 2004-मई 2014 तक केन्द्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार रही और बोफोर्स कांड अनुत्तरित ही बंद हो चुका था।
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