पिछले साल सीबीआई के दो निदेशकों की आपसी कलह की वजह से जांच एजेंसी की छवि को बड़ा नुकसान पहुंचा था। इन अधिकारियों ने जांच एजेंसी को असहजता की स्थिति में ला खड़ा किया था। कई आदेश ऐसे भी जारी हुए थे जो किसी भी तरह से जांच एजेंसी के क्राइम मैनुअल से मेल नहीं खा रहे थे। अधिकारियों ने मनमर्जी चलाते हुए केस की जांच सौंपना, तबादला नीति, केस डायरी तैयार करना, छापेमारी, फोन इंटरसेप्ट प्रक्रिया, आर्थिक और साइबर अपराधों की जांच आदि मामलों में सीबीआई के क्राइम मैनुअल को फॉलो ही नहीं किया।
बुधवार को सीबीआई प्रवक्ता नितिन ने बताया कि इससे पहले 2005 में क्राइम मैनुअल बदला गया था। अब उसमें कई बड़े बदलाव किए जा रहे हैं, जो सीबीआई मुख्यालय में अधिकारियों की एक टीम कर रही है। उम्मीद है कि इस साल के अंत तक सीबीआई को नया क्राइम मैनुअल मिल जाएगा। साथ ही, साइबर क्राइम को लेकर भी जांच एजेंसी विशेष योजना बना रही है। भारतीय राज्यों की पुलिस, इंटरपोल और सीबीआई के बीच साइबर क्राइम को लेकर बेहतर तालमेल बनाने और त्वरित गति से कार्रवाई संभव हो, इसके लिए भी एक नया सिस्टम तैयार किया जा रहा है।
एफबीआई या दूसरे देश, जो साइबर क्राइम में अच्छा काम कर रहे हैं, वहां की तकनीक और जांच प्रक्रिया से जुड़ी कई बातों को नए क्राइम मैनुअल में जगह मिल सकती है। दूसरे देशों से अंतरराष्ट्रीय अपराधियों की जानकारी के लिए सीबीआई के पास प्रार्थना पत्र आते रहते हैं और एजेंसी बिना देरी के उनकी मदद करती है। अगर उन्हें किसी राज्य से कोई सूचना लेनी है तो वह काम भी सीबीआई करती है। नए मैनुअल में विभिन्न पुलिस संगठनों की मोडस ऑपरेंडी, क्राइम के नए-नए तरीकों से निपटना और जांच एजेंसी में विशेषज्ञता, इन सबके बीच सामंजस्य को बढ़ाकर बेहतर काम किया जाएगा।
1996 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिनमें पुलिस के अधिकारों के दुरुपयोग के अनेक मामले सामने आए थे। आरोप लगाया गया था कि पुलिसकर्मी राजनैतिक रूप से पक्षपातपूर्ण तरीके से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं। 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय में केंद्र एवं राज्यों को पुलिस के कामकाज के लिए दिशानिर्देश तय करने, पुलिस के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने, तैनाती और तबादलों का फैसला लेने और पुलिस के दुर्व्यवहार की शिकायतें दर्ज करने के लिए प्राधिकरणों के गठन का आदेश दिया था।
न्यायालय ने यह भी अनिवार्य किया कि मुख्य पुलिस अधिकारियों को मनमाने तबादलों और तैनातियों का शिकार न होना पड़े, इसलिए उनकी सेवा की न्यूनतम अवधि तय की जाए।
अपराध की जांच के लिए दक्षता और प्रशिक्षण, समय और संसाधनों और पर्याप्त फॉरेंसिक क्षमताओं तथा इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। विधि आयोग और दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने टिप्पणी की थी कि पुलिसकर्मियों की कमी और विभिन्न प्रकार के कार्यों के दबाव में राज्य पुलिस अधिकारी अक्सर इन जिम्मेदारियों की अवहेलना करते हैं। इसके अलावा पेशेवर जांच करने के लिए जरूरी प्रशिक्षण और विशेषज्ञता की भी उनमें कमी होती है। साथ ही, उनका कानूनी ज्ञान भी अपर्याप्त होता है (जैसे एडमिसिबिलिटी ऑफ एविडेंस जैसे पहलुओं पर) और एजेंसी का फॉरेंसिक और साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर भी अनुपयुक्त और आउटडेटेड होता है।