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जातिगत जनगणना: सुप्रीम कोर्ट का आदेश- सार्वजनिक नहीं होंगे 2011 के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के आंकड़े

Wed, 15 Dec 2021 02:42 PM IST
संजीव कुमार झा पीटीआई, नई दिल्ली

सार

केंद्र ने अपनी दलील देते हुए कहा था कि 2011 में ओबीसी की संख्या जानने के लिए जातिगत जनगणना नहीं हुई थी। परिवारों का पिछड़ापन जानने के लिए सर्वे हुआ था। लेकिन वह आंकड़ा त्रुटिपूर्ण है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की उस दलील को स्वीकार कर लिया है जिसमें कहा गया था कि 2011 की जनगणना में सामने आए सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन के आंकड़े सार्वजनिक नहीं होंगे। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर महाराष्ट्र सरकार ने याचिका दाखिल की थी। राज्य सरकार ने स्थानीय चुनाव में ओबीसी आरक्षण देने के लिए यह आंकड़े को सार्वजनिक करने की मांग की थी। लेकिन कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी है। एक अहम बात यह भी है कि कोर्ट ने केंद्र के जिस हलफनामे को स्वीकार किया है, उसमें 2022 में भी जातीय जनगणना न करने की बात कही गई है।

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जानिए केंद्र ने क्या दी थी दलील
केंद्र ने मंगलवार को शीर्ष अदालत को बताया था कि एसईसीसी 2011 ओबीसी डेटा  नहीं है और इसे सार्वजनिक नहीं किया गया था क्योंकि यह त्रुटिपूर्ण पाया गया था, और गुमराह करने के लिए बाध्य था। सरकार ने कहा था कि वह पूरी तरह से ओबीसी के लिए आरक्षण का समर्थन करती है, लेकिन यह अभ्यास संविधान पीठ के फैसले के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें प्रकृति की समसामयिक कठोर जांच करने के लिए एक समर्पित आयोग की स्थापना सहित तीन शर्तों का उल्लेख किया गया था।  

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